बजट में कोशी और मिथिलांचल को निराशा हाथ लगी: लवली आनंद

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नौकरी और उद्योग को धड़ल्ले से निजी क्षेत्रों के हाथों सौंपा जा रहा है

सहरसा : बिहार का पिछला बजट 2लाख 25 हजार 438करोड़ का था जबकि इस वर्ष का बजट 2लाख 18हजार 302करोड़ का ही है । पिछले साल की तुलना में इस वर्ष का बजट 7100 करोड़ कम है, जबकि कोरोना संकट की वजह प्रदेश के समक्ष चुनौतियाँ बढ़ी हैं ।उक्त बातेंं राजद नेत्री सह पूर्व सांसद लवली आनंद ने गंगाजल स्थित अपने आवास पर आयोजित प्रेस वार्ता में कही ।

पूर्व सांसद ने कहा कि इस बजट में 20 लाख युवाओं को नौकरी देने के चुनावी वादे पर कोई ठोस ‘ब्लू प्रिंट’ नहीं है । 2 लाख 18हजार करोड़ से इस बिहार बजट में रोजी देने वाले उद्योग विभाग को सिर्फ 1285 करोड़ 17 लाख रु.खर्च के प्रावधान हैं । इतनी कम राशि में न तो बिहार में औद्योगिकरण होगा और न ही रोजगार सृजन होगा। महिलाओं के लिए 35% आरक्षण सुनने में भले ही लुभावना लगे परंतु यह दलितों -पिछड़ों के आरक्षण की तरह ही झुनझुना साबित होगा ।  नौकरी और उद्योग को धड़ल्ले से निजी क्षेत्रों के हाथों सौंपा जा रहा है, जहाँ आरक्षण की कोई व्यवस्था ही नहीं है । यह ‘आरक्षण नीति’ का मजाक है ।

पूर्व सांसद लवली आनंद ने आगे कहा कि ‘लॉक डाऊन’ के दौरान प्रवासी बिहारियों और विस्थापित मजदूरों के समक्ष मुख्यमंत्री का यह आश्वासन कि ‘हम आगे से ऐसी व्यवस्था करेंगे कि आपको काम का अवसर यही मिल सके । रोजी -रोटी की तलाश में आपको अन्यत्र जाना न पड़े । यह बजट इस वादे पर पूरी तरह मौन है । बजट में पलायन रोकने और जीविका प्रदान करने के लिए कोई रूट चार्ट नहीं है । जहाँ तक कोरोना से बचाव और नियंत्रण पर 10 हजार करोड़ से अधिक के खर्च का सवाल है, सब हवा -हवाई है । राज्य की जनता भगवान भरोसे है ।

उन्होंने कहा कि कोशी के साथ एक बार फिर छल हुआ । यहाँ से पहली बार उप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री , ऊर्जा मन्त्री , उद्योग मंत्री सहित एनडीए के पाँच -पाँच मंत्रियों के रहते पिछड़े कोशी और मिथिलांचल को निराशा हाथ लगी । खास कर सहरसा को न पेपर मिल , न नगर निगम , न एम्स , न मेडिकल कॉलेज , सिर्फ एक ‘मॉडल अस्पताल’ का लॉलीपॉप थमा दिया गया । आंकड़ों के मुताबिक क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन का आलम यह है कि पटना जिले प्रति व्यक्ति सालाना आय जहाँ 63 हजार रु. हैं, वहीं शिवहर जिले में प्रति व्यक्ति सालाना आय 7 हजार रु. मात्र है। इतना ही नहीं सहरसा सहित राज्य के 20 जिले ऐसे हैं, जिसकी औसत सालाना आमदनी 10 हजार रु. से भी कम है । हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर बिहार के लिए यह आँकडा़ खेद जनक है परंतु इस क्षेत्रीय विषमता को खत्म करने का बजट में कोई ठोस उपाय नहीं है । कुल मिला कर बजट बिहार चहुंमुखी विकास के लिए अक्षम औऱ दिशाहीन है । यह लुभावने ‘वादों का पिटारा’ मात्र है । संवाददाता सम्मेलन में राजद जिलाध्यक्ष मोहम्मद ताहिर , कॉँग्रेस जिलाध्यक्ष प्रो.विद्यानंद मिश्र , गुनेश्वर प्र.सिंह,रघुनाथ यादव , गजेंद्र कुमार , मो.मोइद्दिन, प्रो.राजेंद्र यादव , रिजवाना खातून , मुकुल भारती , ज्ञानेंद्र सिंह ‘ज्ञानू’ , शंभू सिंह , अनिमेष कुमार , अजय झा , संजय यादव , राजीव सिंह ‘बौआ’, फरजाना खातून, अजय यादव , आशीष सिंह , छोटू सिंह , प्रदीप , मनोहर , मुकेश मो.इफ्तिखार आदि मुख्य रूप से मौजूद थे ।