डॉट्स प्रणाली के तहत टीबी का मुकम्मल इलाज संभव : सिविल सर्जन

Kunal Kishor
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बीमारियों से बचने के लिए जागरूकता जरूरी

सहरसा: टीबी की बीमारी कोई सामाजिक कलंक नहीं बल्कि सुधारे हुए राष्ट्रीय तपेदिक कंट्रोल प्रोग्राम की डॉट्स प्रणाली के तहत इसका मुकम्मल इलाज संभव है। सभी सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में मुफ्त में इसका इलाज होता है। फेफड़ों के अलावा जिस अंग में टीबी होती है उसी अनुसार रोगी में लक्षण दिखाई देते हैं। सिविल सर्जन डॉ अवधेश कुमार ने कहा कि टीबी की बीमारी के प्रति समाज में जो गलत धारणाएं हैं , उनको दूर करने के लिए भी सबको एक साथ होकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा टीबी की रोकथाम के लिए मरीज की जब तक दवा चलती है, तब तक उसे पांच सौ रुपए प्रति महीना पोषण सहायता के तौर पर उसके बैंक खाते से दिए जाते हैं।

बीमारियों से बचने के लिए जागरूकता जरूरी : सिविल सर्जन
डॉ. अवधेश कुमार ने कहा कि बीमारियां से बचने के लिए जागरूकता का होना जरूरी है, क्योंकि जागरूकता से ही बहुत सी बीमारियां से बचा जा सकता है।

टीबी क्या है और कितने प्रकार का होता है:
सिविल सर्जन डॉ अवधेश कुमार ने बताया कि टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) रोग माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु से होता है। इसके दो प्रकार हैं। पहला, पल्मोनरी टीबी (फेफड़े संक्रमित होते) व दूसरा, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (फेफड़ों के बजाय शरीर के अन्य अंगों पर असर व उसी अनुसार लक्षण)।

ड्रग रेजिस्टेंस टीबी क्या है :
सिविल सर्जन डॉ कुमार ने कहा कि इसमें रोग के इलाज में देरी और इलाज के दौरान नियमित दवाएं न लेने पर बैक्टीरिया में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में दवाएं असरहीन हो जाती हैं। विभिन्न एंटीबायोटिक्स लेने से भी जीवाणुओं पर दवा का असर नहीं होता।

बीमारी के लक्षण क्या हैं :
सिविल सर्जन डॉ अवधेश कुमार ने कहा कि शारीरिक कमजोरी, थकान, दर्द, भूख न लगना व वजन में कमी, हल्का बुखार सामान्य लक्षण हैं। फेफड़ों की टीबी में सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, लगातार खांसी, इसके साथ बलगम व कभी कभार खून आता है। टीबी जिस अंग में होती है लक्षण उसी अनुसार आते हैं। जैसे रीढ़ की हड्डी में टीबी से कमरदर्द, किडनी की टीबी में यूरिन में रक्त आना, दिमाग की टीबी में मिर्गी, बेहोशी छाना और पेट की टीबी में पेटदर्द और दस्त।

किस तरह फैलता है यह रोग :
सिविल सर्जन ने कहा कि रोगी के खांसने, बात करने, छींकने या उसके द्वारा प्रयोग में ली गई वस्तुओं के संपर्क में आने से रोग फैलता है तथा फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को भी टीबी होने की संभावना रहती है। इलाज के रूप में दवाएं दी जाती हैं जिन्हें नियमित लेना होता है।