मातृ,शिशु एवं छोटे बच्चों के पोषण पर चिकित्सकों के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन

1784
  • मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में एमआईवाईसीएन भी शामिल
  • बिहार के 5 मेडिकल कॉलेजों ने लिया कार्यशाला में भाग
  • मेडिकल कॉलेजों में एमआईवाईसीएन सेवा में होगा सुधार

पटना: मातृ, शिशु एवं छोटे बच्चे के पोषण पर एम्स में चल रहे दो दिवसीय कार्यशाला का गुरुवार को समापन हो गया. इस दौरान मेडिकल कॉलेजों में मातृ, शिशु एवं छोटे बच्चों के पोषण को लेकर प्रदान की जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार पर विस्तार से चर्चा हुयी. साथ में मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल एमआईवाईसीएन(मातृ, शिशु एवं छोटे बच्चों के पोषण) की गुणवत्ता में सुधार को लेकर चर्चा हुयी. कार्यशाला के पहले दिन का उद्घाटन करते हुए एम्स के निदेशक डॉ.पीके सिंह ने कहा स्वास्थ्यगत मुद्दों पर मेडिकल कॉलेजों को बेहतर नेतृत्व करने की जरूरत है. इसके लिए उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दों पर बेहतर अनुसंधान को आगे बढ़ाने की जरूरत होगी. बेहतर अनुसंधान, सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष मानक तैयार कर एमआईवाईसीएन के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा. इसकी बेहतर पहल करने के लिए उन्होंने अलाइव एंड थराइव को धन्यवाद ज्ञापित किया. चिकित्सीय परामर्श की गुणवत्ता में सुधार की जरुरत :अलाइव एंड थराइव की वरीय कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. अनुपम श्रीवास्तव ने बताया मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की स्वीकृति से एमआईवाईसीएन विषय को भी मेडिकल कॉलेजों के नियमित पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. इसके लिए इसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना जरुरी है. इसको लेकर चिकित्सकीय परामर्श में गुणवत्ता एवं संवेदनशीलता की भी जरुरत है, जिससे मरीज सहजता से अपनी बात चिकित्सक के सामने रख सके. उन्होंने बताया एमआईवाईसीएन सेवा को फैकल्टी फ्रेंडली बनाने की जरुरत है. इससे बेहतर परिणाम सामने आयेंगे.
एरा यूनिवर्सिटी के डीन एवं प्रशिक्षक डा. एमएम फरीदी ने बताया मरीज हमारे सामने हमें भगवान का रूप मानकर अपनी तकलीफ बताने आते हैं. इसलिए हम चिकित्सकों की जिम्मेदारी बनती है कि हम उन्हें परामर्श देते समय अपने व्यवहार पर ध्यान दें. मरीजों के साथ बेहतर व्यवहार उनकी समस्या को कम करता है. परामर्श के समय अपने आप को मरीज की जगह रखकर देखने एवं सोचने की जरुरत है तभी हम अपने में यह व्यवहार परिवर्तन ला सकते हैं. मरीज के साथ विनम्र, संवेदनशील एवं धैर्ययुक्त व्यव्हार की जरुरत होती है ताकि मरीज भयमुक्त व तनावमुक्त होकर अपनी तकलीफ बता सके एवं चिकित्सक को हमदर्द समझ सके.
परामर्श में संवेदनशीलता पर दिया गया बल:सभी शामिल चिकित्सकों ने माना की मरीजों को परामर्श देते समय अक्सर उन्हें अपने व्यवहार एवं शारीरिक हावभाव का ध्यान नहीं होता है . वह समय के अभाव के कारण मरीज को परामर्श देकर अथवा दवाइयां लिखकर चलता करते हैं तथा अगले मरीज से बात करते हैं. चिकित्सकों ने बताया अपने कार्यकाल की अवधि के दौरान उन्हें कभी इस बात का अहसास भी नहीं हुआ तथा इस कार्यशाला ने उन्हें इस पहलू से अवगत कराया गया है.
परामर्श की तकनीक पर रहा बल-
कार्यशाला में शामिल चिकित्सकों को चिकित्सकीय परामर्श के नए तकनीकों से साझा किया गया जिसमे संवेदनशीलता प्रमुख मुद्दा था. उन्हें प्रशिक्षण के उपरान्त अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहे मरीजों के सामने नयी तकनीक से परामर्श को प्रदर्शित करने को भी कहा गया, जिसमें सभी ने पूरे जोश के साथ अपनी सहभागिता दर्ज करायी. स्तनपान की विधि पर डाली गयी रौशनी-
सही तरीके से स्तनपान कराना माता के लिए सहज एवं सुगम होता है. लेकिन अक्सर माताएं जानकारी के आभाव में स्तनपान के दौरान कुछ बातों पर ध्यान नहीं देतीं हैं. कार्यशाला के दौरान शिशु के सर की स्थिति, स्तन का सही भाग शिशु के मुख में जाना, शिशु को किसी तरह की तकलीफ होना आदि चीजों पर सही दृष्टिकोण अपनाकर परामर्श देने की बात भी कही गयी तथा शामिल चिकित्सकों से इसका नाट्य रूपांतरण भी खिलौनों के साथ कराया गया.
इन संस्थानों ने लिया प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सा– दो दिवसीय कार्यशाला में पटना मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल(मुजफ्फरपुर), अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (गया), एवं एम्स(पटना) के चिकित्सकों ने प्रशिक्षण का लाभ उठाया.