सप्त दिवासीय ध्यान-साधना शिविर का आयोजन किया

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ध्यान-साधना शिविर का समापन

सहरसा : हरवर्ष की भांति इस वर्ष भी शरदीय नवरात्रि के अवसर पर शहर के वार्ड न.08 स्थित संतमत सतसंग मंदिर मे सप्तदिवासीय ध्यान-साधना शिविर का आयोजन किया गया था ,जिसका समापन आज गुरु विदाई के साथ संपन्न हुआ ।इस अवसर पर प्रसाद भी वितरण किया गया सप्तदिवासीय ध्यान-साधना शिविर के दौरान साधकों एवं संतमत के अनुनियाओ ने भक्ति रस मे डुबकर संतो महात्माओं के ज्ञान को सुना ।ध्यानभ्भायस कार्यक्रम के समापन सत्र मे प्रवचन करते हुए स्वामी किशोरनंद जी महराज ने कहा कि हमारे सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज कहते हैं कि, जैसे बिना दूल्हे की बारात बेकार होती है, उसी तरह मनुष्य जीवन ईश्चर-भक्ति के बिना बेकार हैं। ईश्चर-भक्ति के लिए ईश्वर के स्वरुप का ज्ञान होना चाहिए। ईश्चर -भक्ति के लिए बहुत से शास्त्रों को मथने की कोई आवश्कता नहीं है। अंतर ज्योति और अंतर-नाद के लिए सभी पहुंचे हुए संत और माननीय धर्म ग्रंथों में लिखा है। उसे जानों, खोजो तो सब चीज की जानकारी हो जाएगी। ईश्चर सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इसलिए उस की भक्ति अवश्य करो । स्वामी जी ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य शरीर की बनावट और विश्व ब्रह्मांड में समानता है। इसको समझने और प्रत्यक्ष करने के लिए आध्यात्मिक साधना की आवश्यकता होती है । अंतर साधन में आंख बंद करके देखने पर प्रकाश और शब्द मिलता है। इस बात की पुष्टि बड़े-बड़े संतों और वेद-उपनिषदों में भी है । अनेक तरह के विघ्नों को पार करते हुए जो साधक प्रकाश और शब्द साधना में सफलता प्राप्त करता है, वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह शक्ति संपन्न होते हुए अंत में परमात्मा ही हो जाता है। स्वामी महेशानंद बाबा ने कहा कि लोग दुख ना हो, इस डर से काम करते हैं। डर से ही लोग खेती करते हैं, नौकरी करते हैं, पढ़ते हैं एवं अन्य काम करते हैं। स्वर्ग में भी सुख-दुख लगा रहता है। इसलिए देवता भी मनुष्य शरीर में आना चाहते हैं। क्योंकि मनुष्य सरीर से ईश्वर-भक्ति करके परम सुखी हुआ जा सकता है? संतों का उपदेश विषय-सुखों से ऊपर उठने का है। इसके लिए जो योग्य गुरु से की विधी को जानकर साधन करते हैं, वह परम सुख को प्राप्त करते हैं। साधना में तरक्की के लिए संयम की आवश्कता है।उन्होंने कहा कि संतो की पहचान दुर्लभ है। संत कैसे होते हैं?जो पहुंचे हुए संत होते हैं, उनके संग को ही सत्संग कहते हैं। सत्संग भगवान का निज अंग है।मनुष्य माता के गर्भ से ही दुख उठाते हुए आगे बढ़ता है और विभिन्न तरह के विकारों में इसके विभिन्न तरह के भोगों को भोगता है। संतों का ज्ञान इनसे छूटने के लिए होता है । जो सत्संग से मिलता है। सत्संग से ईश्वर स्वरुप का ज्ञान होता है ।