सत्ताधारी तीर के निकट जाने के लिए चलाए जा रहे महोत्सव के बहाने अंगिका के तीर

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अंगिका महोत्सव या महज संगोष्ठी
कटिहार@गौतम सुमन : 23 जून  रविवार के दिन कटिहार में आयोजित अखिल भारतीय अंगिका साहित्य विकास समिति के द्वारा होने वाला अंगिका महोत्सव क्या वाकई में अंगिका महोत्सव है या फिर इसे जबरदस्ती महासभा कहा जा रहा है।
इस 5- 6 घंटे के कार्यक्रम में वक्ता एवं विद्वान अंगिका भाषा की समस्या पर कितना कुछ कह पाएंगे और किन निष्कर्षों पर पहुंच पाएंगे ?  यह अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतनी कम अवधि में जिसमें कि एक कवि सम्मेलन भी होना तय है; क्या अंगिका से संबंधित सारी बातें इसमें उभर पाएंगी? हकीकत तो यह है कि अंगिका महोत्सव नाम देकर इस छोटे से कार्यक्रम के बहाने सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ नेताओं के करीब जाने की जुगत कुछ लोग भिड़ा रहे हैं। वे अंगिका के तीर के माध्यम से सत्तारूढ़ तीर के करीब जाना चाह रहे हैं। उनकी मंशा अंगिका का विकास या फिर अंगिका भाषा की उन्नति नहीं है। इन चन्‍द घंटों में सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं के साथ अपनी जुगत भिड़ा कर कुछ और ही जुगाड़ में हैं । हम जानना चाहते हैं कि इस महोत्सव का आयोजन करने वाले अंगिका के तथाकथित पहरेदार उस समय कहां थे…जब भागलपुर से लेकर पटना और दुमका से राँची की सड़कों तक इन्‍क्‍लाबी तेवर के साथ अंगिका भाषा के उत्थान, अंगिका भाषा की पहचान,अंगिका अकादमी का गठन कर स्‍कूल स्‍तर से काॅलेज स्‍तर तक अंगिका भाषा को पढ़ाई का विषय बनाने, अंग क्षेत्र के सभी रेलवे स्टेशनों से अंगिका भाषा में भी सूचना प्रसारण करने- कराने कथा  भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में  अंगिका भाषा को शामिल करने  कराने के सवाल को लेकर धूप  व छांव  परवाह किय बगैर लोग सड़कों पर चरणबद्ध आंदोलन कर रहे थे और कहीं-कहीं लाठियां भी खा रहे थे। तब  ऐसे महोत्सव  के बहाने नौटंकी करने वाले लोग क्यों नहीं उनके समर्थन में आगे आए जो चिलचिलाती धूप में भी अंगिका में चन्‍द सांसें ले रहे थे…?उनके इस हक-हकूक की आवाज को और भी जोर एवं स्वर देने के साथ-साथ इसे और भी ताकत देने के लिए यह लोग क्यों अपने अपने घरों में बंद थे और क्‍यों अपने- अपने घरों की कुंडियाँ लगा रखी थी ? अगर इस आंदोलन में ये तथाकथित अंगिका के पहरेदार साथ देते तो आज अंगिका का स्वरूप कुछ और होता ।
सच तो यह है कि तब ये तथाकथित अंगिका के पहरेदार  ऐसे आंदोलनों को देखकर जल और भूनकर उनकी हंसी उड़ा रहे थे । जबकि अंगिका के उसी संघर्ष व आंदोलन के फलस्वरूप और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उदारता के कारण अंगिका अकादमी खड़ी हुई है। बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार ने जिस सुल्तानगंज के मैदान से अंगिका अकादमी के गठन की घोषणा की थी,उस समय उनकी आवाज में अंगिका का जादू था और ऐसा लग रहा था कि उस शख्स के दिल में अंगिका का दर्द व अंगिका का एहसास है। उस व्यक्ति ने दिखा दिया कि अंगिका के समग्र विकास के लिए कुछ भी करने को वे तैयार हैं और उन्होंने वर्षों से चिरलंबित मांगे अंगिका अकादमी का गठन करके लोकभाषा के प्रति अपनी उदारता को साबित कर दिया। शायद नीतीश कुमार  जैसे विरले नेता ही मिलते हैं, जो इतनी जल्दी अपनी हर बातों और हर घोषणाओं पर अमल करते हैं। नीतीश कुमार जी भले ही नालंदा क्षेत्र के हों लेकिन उनके दिलों में लोटभाषा अंगिका बसती है। अंगिका नीतीश कुमार के दिलों में धड़कती है,इसलिए तो हर अंगिका भाषी ने उनका साथ दिया है और आगे भी साथ देने के लिए बचनबद्‍ध है। उनके कदम के पीछे चलने को हर अंगिका भाषी तैयार है और इसीलिये उन्हें सत्ता की ताकत भी दी है। नीतीश कुमार सिर्फ बिहार के नहीं बल्कि समूचे हिंदुस्तान के कद्दावर नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने अंगिका के बारे में सोचा है लेकिन अकादमी के गठन के बाद जो होना चाहिए था उस अकादमी पर बैठे लोगों ने ऐसा होने नहीं दिया और अब वही लोग और उनके कुछ पीछे-पीछे चलने वाले तथाकथित पहरेदार अंगिका महोत्सव का आयोजन कर अपनी गोटी फिट करने के प्रयास में जुड़े हुए हैं। वे शतरंज की बिसात पर अपनी जीत तय करना चाहते हैं।
यह तो अच्छा है कि कुछ अंगिका प्रेमियों व अंगिका भाषियों सहित अंगिका साहित्यकारों को आमंत्रित कर 23 जून को कटिहार में आयोजित इस महोत्सव की गरिमा आयोजकों ने बचाई है लेकिन अपनी कुत्‍सित सोच के कारण ऐसे बहुत सारे लोगों को छोड़ दिया गया है, जिनके बगैर अंगिका साहित्य, अंगिका लेखन और सृजन की कल्पना करना भी बेईमानी है। सबसे पहले तो आयोजक ने बिहार अंगिका अकादमी के पहले अध्यक्ष प्रो. लखनलाल सिंह आरोही का नाम आमंत्रण कार्ड में ना छाप कर बेईमानी की है। इतना तो तय है कि चाहे श्री आरोही जी कुछ भी हों पर वे बिहार अंगिका अकादमी के पहले अध्यक्ष की गरिमा तो है ही और उनकी गरिमा किसी नेता व किसी सियार से बड़ी तो है ही। ऐसे में उनका नाम आमंत्रण कार्ड में न देना हमें बहुत ही अनुचित लग रहा है। अंगिका के ऐसे कार्यक्रमों में अंगिका के बड़े विद्वान डॉ. अमरेंद्र को उपेक्षित रखना,हमें कहीं से भी  उचित नहीं लगता है ।ऐसी कुत्‍सित सोच यह स्पष्ट करता है कि आयोजक मंडल व तथाकथित अंगिका के पहरेदार अपनी पीठ खुद थपथपा ने की मनसा रखते हैं। अंगिका के बहुत सारे विद्वान जैसे डाॅ. तेज नारायण कुशवाहा,हीरा हरेन्द्र,भाई सत्‍यानंद, प्रो.मधुसूदन झा,प्रॊ.बहादुर मिश्र, प्रो.राम चंद्र घोष,कुंदन अमिताभ, चंद्रप्रकाश जगप्रिय,कुलगीतकार आमोद मिश्र, दिनेश बाबा तपन,अनिरूद्‍ध प्रसाद विमल,धनंजय मिश्र,रामधारी सिंह काब्‍यतीर्थ,गीतकार राजकुमार,राहुल शिवाय, कैलाश झा किंकर,जनार्दन यादव, सकलदेव शर्मा,प्रीतम विश्वकर्मा कवियाठ, इंदु भूषण मिश्र, मनोज पांडे, मनोज पंडित सागर,लक्ष्मी नारायण मधुलक्ष्मी,सुजाता कुमारी, माधवी चौधरी,डॉ.मृदुला शुक्ला, डाॅ.मीरा झा,ई.अंजनी शर्मा,ई.नंदलाल शारश्वत, प्राणमोहन प्रीतम, बाबा मनमौजी कर्णअंगपुरी,डॉ. जयंत जलद,महेंद्र निशाकर, नवीन निकुंज, विकास गुलटी,कथाकार रंजन,गौतम यादव,परमानंद प्रेमी,लखनलाल पाठक,बाबा बिजेंद्र,प्रसून लतांत,प्रकाश सिंह प्रीतम,उमाकांत झा अंशुमाली, हास्‍यावतार रामावतार राही,विष्‍णु मंडल विकल, पारस कुंज,धीरज पंडित,महेंद्र मयंक, कपिलदेव ठाकुर, जगदीश यादव, नकुल निराला, नरेश ठाकुर निराला, देवेंद्र दिव्यांशु, देवेंद्र नाथ दिलबर,हिमांशु राधे कृष्णा, श्रीकांत व्यास, जगतराम साह कर्णपुरी,विदूशेखर पांडे,आर.प्रवेश, कुमार गौरव,मुरारी मिश्र,अनूप बाजपेई आदि जैसे भागलपुर एवं अंग क्षेत्र स्‍थित अन्‍य जिलों के प्रकांड विद्वानों को आमंत्रित न करके एवं  आमंत्रण-कार्ड में उन्हें शामिल ना करके इस महोत्सव को एक संगोष्ठी में ही बदलने का प्रयास किया गया है। महोत्सव का मतलब महा उत्सव होता है लेकिन यह महा उत्सव ना होकर एक छोटी सी संगोष्ठी है,जिसमें शायद ही कोई निष्कर्ष तक लोग पहुंच पाएंगे। यह सत्ताधारियों तक पहुंचने की महज मात्र कुत्‍सित सोच को सफल करने की महज कोशिश है और अपनी रोटी सेकने की जुगत।
निश्चित रूप से मुझे यह महोत्सव महज वैसा ही नौटंकी लग रहा है जैसा कि  आयोजन समिति के  अध्यक्ष अपने जन्मदिन पर,अपने ही घर में हर वर्ष अंगिका दिवस के रूप में करते रहे हैं और इस नौटंकी के नाम पर साहित्यकारों को बुला करके उन्हें भी नौटंकी का एक पात्र बनाने का प्रयास करते हैं।
“समय सोचने का फैसला आपका”
(लेखक :केंद्रीय अध्यक्ष,अंग उत्थान आंदोलन समिति,बिहार-झारखंड )