सुहागिनें हर्षोल्लास के साथ मना रही हैं आस्था का पर्व “बर्साइत”

मधुबनी से बी.चन्द्र की रिपोर्ट

सुहागिनों के आस्था का पर्व “बरसाईत” आज पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस पर्व को वट सावित्री पर्व के नाम से भी जाना जाता है। सुहागिनें इस पर्व को पूरे आस्था और विश्वास के साथ मानती है। हर सुहागिन इस दिन वट वृक्ष की पूजा अर्चना करती हैं। महिलाएँ आज के दिन सोलहों श्रृंगार करके वट-सावित्री पूजा करती है और अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं। महिलाएँ इस दिन अपने लिये अखंड सौभाग्यवती होने की प्रार्थना भी ईश्वर से करती है। महिलाएँ इस दिन उपवास रखती है तथा आम, लीची, सेव आदि फलों और श्रृंगार सामग्री से वट वृक्ष के नीचे पूजा करती हैं।
प्रतिवर्ष सुहागिन महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में भगवान विष्णु जी व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव जी निवास करते हैं। वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। पराशर मुनि के अनुसार- ‘वट मूले तोपवासा’ ऐसा कहा गया है। पुराणों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। सति सावित्री की कथा सुनने व वाचन करने से सौभाग्यवति महिलाओं की अखंड सौभाग्य की कामना पूरी होती है।
                       प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिंदू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है।
                        सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी। तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के ये तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा।
                           सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास वापस आ गई जहाँ सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। वट सावित्री अमावस्या के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन और व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।
पर्व को लेकर आज सुबह से ही जिले के विभिन्न वट वृक्ष के नीचे महिलाओं का आना शुरू हो गया। महिलाएँ सज-धज कर पूरे आस्था के साथ वट सावित्री की पूजा अर्चना कर रही हैं। राजनगर के बाबा भूतनाथ मंदिर, महाशक्ति माँ वैष्णवी दुर्गा मंदिर प्राँगण मिर्जापुर, सिमरी, परिहारपुर, बलहा आदि स्थानों पर सुबह से ही सुहागिनों द्वारा वट वृक्ष की पूजा की जा रही है। जयनगर प्रखंड मुख्यालय स्थित कमला नदी में स्नान कर महिलाएँ वट सावित्री पूजा में लीन हैं। जिले के बेनीपट्टी के उच्चैठ भगवती स्थान, रहिका, बासोपट्टी, साहरघाट, खुटौना, बाबूबरही, खजौली, झंझारपुर, मधेपुर सहित जिले के सभी क्षेत्रों में बरसाईत पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। वट सावित्री पर्व को लेकर सभी धार्मिक स्थलों और मंदिरों को सजाया गया है ।