सब्र और त्याग का माह है रमजान : गौतम

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नेता व राजनीति से देश को निजात रख विगत 13 वर्षों से रोजे में रहकर देश के हर तबकों को खुशहाल देखने की है तमन्ना

रोजा रखने या एक और नेक बने रहने के संदेश को लेकर संप्रदायिक सद्भाव को बरकरार रखने के कार्य से लोग मुसलमान हो जाता है तो हर किसी को मुसलमान बन जाना ही उचित है.

भागलपुर : हर वर्ष रमजानुल मुबारक चांद का दीदार कर अंग महाजनपद की समृद्धि एवं अंग वासियों की प्रगति व उन्नति की कामना को लेकर अंग उत्थान आंदोलन समिति बिहार झारखंड के केंद्रीय अध्यक्ष सह जस्टिस फाॅर विक्टिम फ्रंट के कार्यकारी अध्यक्ष गौतम सुमन पाक-ए-रमजान माह का रोजा हर वर्ष की भांति आरंभ किया है। इंसानियत की इस मिसाल को अबकी बार 13वें वर्ष जारी रखकर उन्‍होंने आज नौवें दिन इस माह को सब्र और त्याग का माह बताते हुए लोगों को सर्वप्रथम अपनी जुबान को पाक साफ रखकर मानव सेवा में खुद को समर्पित करने का अनुरोध किया और कहा कि ऊंच-नीच व जात-पात को त्याग कर इंसानियत का परिचय देना ही सच्चे भारतीय व मानवता की पहचान है। उन्होंने कहा कि ऊपर वाला उन्हीं के साथ होता है जिनकी जुबान पाक-साफ होती है और ऐसे लोगों पर ही ऊपर वाले रहमतों की बरसात करते हैं। उन्होंने सच्चे हिन्दुस्तान की कल्पना करते हुए अपनी दिली इच्छा को स्वरचित रचना की पंक्ति से दोहराते हुए कहा कि ” मस्जिद में रामायण हो, मंदिर में हो कुरान; गुरुद्वारे में घंटी बजी, गिरजाघर में हो अजान तो समझें सच्चा हिन्दुस्तान और भारत देश महान”। श्री सुमन ने रमजान के पाक-ए- महीने में आज नौवें रोजे पर हिन्दी मैं रचित कुरान को पढ़ने के बाद लोगों को बताया कि माह- ए- रमजान में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं।उन्होंने यह भी कहा कि रमजानुल मुबारक का पहला अशरा रहमत दूसरा मगफेरत एवं तीसरा अशरा जहन्नुम से निजात दिलाने का है। यह हर इंसान के लिए इसलिए जरूरी है कि इसी माह में कुरान शरीफ ताजिल हुआ था और इसी माह में कई त्योहारों का संगम भी होता है। उन्होंने कहा कि पिछले 13 वर्षों से इस पाक-ए- माह में तीसों रोजा रखते आ रहे हैं और रोजा केवल भूखे रहने को नहीं बल्कि झूठ- फरेब, लड़ाई-चुगली,गाली-ग्‍लौज एवं हर उन बुरे कार्यों से परहेज रखने को कहा जाता है,जिससे समाज का वातावरण और अपना तन-मन दूषित होता है। उन्होंने लोगों को नेक व एक बने रहने की सलाह देते हुए कहा कि हमारा मुल्क दुनिया के लिए मिसाल है जहां हिंदू ईद और मुस्लिम दिवाली मनाते हैं। उन्होंने सियासी लोगों और कुत्सित राजनीतिज्ञों से परहेज करने की अपील करते हुए लोगों से कहा कि हमें या कदापि नहीं भूलनी चाहिए कि ऊपर वाले ने हमें इंसान का रूप दिया है और हमारा लहू एक है, अपने लहू की अंतिम बूंदे भी हम नेक कामों में लगाएं और सदैव नेक बने रहने का संकल्प लें, तभी हम ऊपर वाले की रहमतों को पा सकते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें रोजे में देखकर कई लोग उन्हें चिढ़ाते हैं कि हमने धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम धर्म को अपना लिया है, ऐसा सुनकर हमें हंसी आती है और हम ऐसे लोगों से कहना चाहते हैं कि यदि नेक और एक बने रहने के इस संदेश के उद्देश्य या सांप्रदायिक सद्भाव के इस प्रचार-प्रसार हेतु समर्पण रहना मुस्लिम होने या धर्म परिवर्तन करने का संदेश देता है तो हर एक व्यक्ति को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाना चाहिए। हमें कोई धर्म या मजहब आपस में लड़ने-झगड़ने या एक दूसरे का अपमान करने का सीख नहीं देता है । उन्होंने अपने रोजे में रहने के नियम व कायदे को बताते हुए कहा कि इस पाक-ए- माह में वे मुस्लिम भाईयों की तरह ही सुबह उठकर सेहरी खाते हैं और दिन भर हिंदी में कुरान- ए-मजीद को पढ़कर लोगों से एक व नेक बने रहने का अनुरोध करते हैं। शाम में मुस्लिम भाइयों की तरह ही वे ईफ्‍तारी करते हैं। उन्होंने बताया कि दिन में वे अपने हिस्से का भोजन किसी एक गरीब को खिलाते हैं और इस माह में वे अपने बाल-दाढ़ी व नाखून नहीं कटवाते हैं, पूरे माह गद्दे या सोफे पर नहीं सोकर वे जमीन पर एक चटाई बिछाकर सोते हैं और ईद के दिन अपने लिए कभी उन्होंने नए कपड़े नहीं खरीदें बल्कि इस दिन 5 जोड़ी नए कपड़े लेकर किसी गरीब मोहल्ले में जाकर गरीब बच्चों को अपने हाथों पहनाकर उसके साथ भोजन करते हैं और इन गरीब बच्चों की खुशी व हंसी को ही वे अपना ईद मानते आ रहे हैं । उन्होंने अंतिम में कहा कि उन्‍हें खुशी है कि शुरू में उनके इस तरह के कार्यों से चीढ़ने वाले उनके परिजन विगत 2 सालों से उनके इस तरह के नेक कार्यों में अपना हाथ बंटाते आ रहे हैं। उन्होंने लोगों के इस बात को भी नकारा कि वे ऐसा कर के नेता बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे कभी नेता या अभिनेता बनने की कल्पना तक नहीं करते बल्कि वे चाहते हैं कि हमारे देश को नेता और राजनीति से निजात मिले और हमारे देश में हर तबके के लोग खुशहाल रहे, एक रहे और नेक रहे।
बहरहाल,गरीबी को कोढ़ की तरह खुद में चिपकाकर जीने वाले इस सांप्रदायिक सद्भाव के जीते- जागते मिशाल और सच्चे सामाजिक शुभचिंतक को हम नमन करते हैं और आशा करते हैं इनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो क्योंकि इसकी जरूरत है आज इस देश को, इस समाज को और समाज के हर तबकों को।