शिवगुरु चर्चा से माहौल हुआ भक्तिमय…

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दो दिवसीय शिव गुरु महोत्सव का समापन आज

सहरसा : स्थानीय न्यू कॉलोनी चिल्ड्रेन पार्क में आयोजित दो दिवसीय विराट शिव गुरु महोत्सव के दूसरे दिन कई गायकों के भजन उपरांत कार्यक्रम प्रवचन से शुरू किया गया।

जिसमें वक्ता रमण प्रकाश ने कहा कि अहंकार प्रेम की सारी संभावनाओं को नष्ट कर देता है। अहंकार ह्रदय की हत्या कर देता है। वह उसे प्रेम करने में असमर्थ बनाता है। प्रेम नष्ट हो जाता है और आदमी एक शुष्क बंजर मरुस्थल बन जाता है। अगर गंदे और मैले कपडे से हमें शर्म आती है तो गंदे और मैले विचारों से भी शर्म आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अहंकार की बस एक ही खराबी है कि यह आपको कभी भी महसूस नहीं होने देता कि आप गलत हैं। नेक इंसान बनने के लिए वैसे ही कोशिश कीजिए जैसे खूबसूरत दिखने के लिए करते हैं।

विवेकानंद ने कहा कि जो बाहर की तरफ देखता है वह स्वप्न देखता है और जो अंदर की तरफ देखता है वह जाग जाता है। उन्होंने अनुशासन और शिवचर्चा विषय पर कहा कि वैसे तो अनुशासन का अर्थ संदर्भ के अनुसार बदलता रहता है। परंतु उसका मूलभाव प्रत्येक संदर्भ में नियंत्रित होना ही है। नियंत्रित  होने से तात्पर्य है नियम के अनुकूल होना। अब सवाल उठता है कि किस नियम के अनुकूल होना। यहीं समझ में आती है अनुशासन का स्वरूप स्थान विशेष के हिसाब से बदल जाता है। अनुशासन का सबसे छोटा इकाई परिवार फिर समाज फिर राष्ट्र फिर विश्व स्तर से है। इसके अलावे विभिन्न संस्थानों का, विभिन्न समुदायों का, विभिन्न संप्रदायों का, विभिन्न पंथों का अनुशासन अपने तरह का होता है। अनुशासन का अर्थ डर या भय कभी नहीं है। अनुशासन का अर्थ नियमों पर चलते हुए स्वयं में आपसी सामंजस्य सौहार्दता प्रेम आदि को पैदा करना है। किसी भी मंच का अपना एक उद्देश्य होता है तो उस उद्देश्य के अनुकूल उसका अनुशासन होता है। विवाह के मंच पर श्राद्ध की बातें नहीं होती और श्राद्ध के स्थल पर मुंडन या  यज्ञोपवीत की बातें नहीं होती। हम कह सकते हैं की “हंसुआ के विवाह में खुरपी का गीत “नहीं होता। जब राष्ट्रीय अनुशासन की बात होगी तो राष्ट्र के संविधान के सम्मान और पालन की बात होगी। जब गुरु या इष्ट के संदर्भ की बातें होंगी तो बातचीत के केंद्र में अपने गुरु या अपना इष्ट ही होंगे। अब गुरु अगर शिव है तो सारे पंथ्यों और सारे संत महंतों की  बातों को यानी डिबेट को घुमा फिरा कर शिव के बिंदु पर ले जाना होगा, तभी वह मंच गुरु शिव का कहलायेगा। मंच गुरु महादेव का है और बातें अल्लाह, गॉड, साईं बाबा, जीसस, गृह गुरु, हिंदी वाला सिनेमा गुरु, राजनीतिक गुरु, पॉकेटमार गुरु, विद्यालय गुरु, सेक्स गुरु, सेंसेक्स गुरु आदि विभिन्न गुरुओं की बातें चल रही हो तो मंच शिव गुरु का नहीं कहला सकता। अगर इन सब गुरुओं की बातों में से शिव गुरु को सत्य साबित किया जा सके तो बातें शिव गुरु की होगी और मंच भी शिव गुरु का होगा। अगर बातों से समाज में शिव गुरु सत्य साबित नहीं हो रहे तो मंच शिव गुरु का नहीं है। हम कह सकते हैं कि शिवगुरु के मंच की आड़ में हम अपने वाहवाही को बढ़ा रहे हैं। यह कार्य शिवगुरु मंच का अनुशासन नहीं हो सकता। कुरान, पुरान, वेद, बाइबिल सबों की बातें हो अच्छी बात है परंतु इन सबों के प्रवक्ताओं को यह सिद्ध करना होगा कि वेद बाइबिल कुरान पुरान सबों  एक ही तत्व की व्याख्या की है जो तत्व परमात्मा  कचलाता है। परमात्मा स्वयंभू हैं। वहीं स्वयंभू शिव है। अगर वक्तव्य शिव से शुरू होकर शिव पर समाप्त होता है और श्रोताओं के जेहन में शिव को स्थापित करता है तो मंच शिव गुरु का है वरना मंच स्वार्थ का है। स्वयं को स्थापित करना और शिव को स्थापित करना दो अलग अलग बातें हैं। शिव गुरु मंच पर श्रोताओं के जेहन में गुरु शिव को स्थापित करना यानी जागृत करना यानी शिव को पैदा करना विराट शिव गुरु मंच का अनुशासन है। लोगों के जेहन से शिवगुरु के जगह स्वयं को या अपने आका को या विभ्रमता को पैदा करना शिव गुरु मंच का अनुशासन तोड़ना है। हर व्यक्ति को आत्मचिंतन करना चाहिये। दूसरे को उपदेश देने से पहले हर इंसान को अपने चेतना में झांकना चाहिये।

उग्र नारायण गिरी ने कबीर के दर्शन पर गहराई से चर्चा की। पहले दिन शनिवार को स्वामी दुर्गानंद सरस्वती, आनंदमार्गी  स्फोटाचार्य सहित अन्य विद्धवान वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे ।

इस विराट शिव गुरु महोत्सव का मंच संचालन सुमन कुमार सिंह और अमरनंद राय ने किया। भजन में चंद्रशेखर शर्मा, मनोज कुमार, अनिल कुमार, जगदीश कुमार, सीताराम कुमार और उस्ताद पुरीश ने गायन किया।