हमें इंसानियत वाला बल्ब जलाने की जरूरत है: सरिता राय

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गरीब और बाल श्रमिक बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जला रही है बिहार की बेटी सरिता….                                       
सहरसा : काश.. बनाने वाले ने थोड़ी सी होशियारी और दिखाई होती इंसान थोड़े कम और इंसानियत ज्यादा बनाई होती। दरअसल हमारा समाज इतना स्वार्थी हो गया है कि उसे किसी के दर्द से कोई हमदर्दी ही नहीं रह गई है। लेकिन इसी स्वार्थी समाज में इंसानियत आज भी जिंदा है। जी हां आज मैं एक ऐसे दया की मूर्ती और एक मां का फर्ज अदा करने वाली समाजसेवी महिला की बात करने जा रहा हूं जिसे जानकर हैरानी ही नहीं होगी बल्कि इस स्वार्थी समाज के लोगों को खुद पर शर्म भी महसूस होगा। जी हां मैं जिस दया की मूर्ती के बारे में चर्चा करने जा रहा हूं वो पटना के हाजीपुर के एक छोटे मोहल्ले बड़े युसूफपुर की रहने वाली है और इनका नाम है सरिता राय। अब आप सोच रहे होंगे कि इन्होंने ऐसा क्या कर दिया तो ये बताने से पहले मैं आपको ये बता दूं कि अगर हमारे देश का कोई भी व्यक्ति किसी एक बच्चे को भी शिक्षित करने और उसका जीवन सफल बनाने का प्रयास करने में लग जाए तो जरा सोचिए जनाब कि इतनी बड़ी जनसंख्या में न जाने कितने गरीब बच्चों का जीवन बदल जाएगा। जी हां ये वही सरिता राय है जो अपने मुहीम टॉपर स्टडी पॉइंट (उड़ान) के माध्यम से गरीब और बाल श्रमिक बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जला रही है वो भी बिना किसी अनुदान लिए। जरा सोच कर देखिये क्या है आप में और इनकी सोच में फर्क। यहां आपको बताना चाहेंगे कि सरिता राय के अंदर ये सोच बचपन से ही इनके दिल और दिमाग पर अपना कब्जा जमा रखी थी। गरीब बच्चों के लिए दिल में प्यार लिए सरिता राय ने जिस जज्बे को मुक्कमल किया वो आज के वक्त में शायद ही किसी के अंदर दिखेगा। सरिता राय की पढ़ाई जैसे ही पूरी हुई इन्होंने गरीब और बेसहारा बच्चों को पढ़ाने और उनके भविष्य संवारने का फैसला अपने दिल और दिमाग में ठान लिया। आज के वक्त में लोगों की सोच इतनी गिर गई है कि खेलने और खाने की उम्र में लोग इन मासूम बच्चों के हाथों में किताब की जगह रिपेयरिंग औजार पकड़ा देते है और अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए बाल मजदूरी का काम करवाते है। बेचारे गरीबी के थपेड़ों को झेलते हुए ये बच्चे बाल मजदूरी करने को मजबूर हो जाते है और पूरे दिन का सौ या पचास रूपये कमाकर खुशी-खुशी घर चले आते है। लेकिन सरिता राय इन बच्चों के लिए अपना कीमती वक्त निकालकर इनको मुफ्त शिक्षा प्रदान करती है। जिससे इन बच्चों का भविष्य भी एक चमकते सितारे की तरह बन सके। सोचिये जहां इन गरीब बच्चों के माता-पिता को भी इस बात का अनुभव नहीं रहता होगा कि उनके बच्चों का भविष्य आज भी सरिता राय जैसी मां का फर्ज निभाने वाली महिला के हांथों संवर सकता है। लेकिन एक कहावत शायद गलत नहीं कही गई है जिनका कोई नहीं होता उनका खुदा होता है….आपको बताना चाहेंगे कि सरिता राय ने इस काम को जादू की छड़ी घुमाकर नहीं किया बल्कि बहुत ही मेहनत और परिश्रम से किया। इन गरीब बच्चों के जीवन को सुधारने में सरिता राय ने खुद के जीवन में बहुत जोखिम उठाया। सबसे बड़ी मुश्किल जो थी इनके इस लक्ष्य को पूरा करने में वो थी इन गरीब बच्चों के माता पिता को समझाना। क्योंकि उनको लगता था कि बच्चे पूरे दिन में जो सौ-पचास कमाकर ले आते हैं कहीं ऐसा न हो कि इस गरीबी में उनका जीवन भी न सुधर पाए और खाने के भी लाले पड़ जाएं। लेकिन सरिता राय इन अभिभावकों को समझाने में सफल रहीं और इन बच्चों के जीवन को दिया एक नया पंख। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते है लेकिन हम कभी भी उन बच्चों के लिए एक कदम भी बढ़ाना उचित नहीं समझते हैं। सरिता राय कहती है शिक्षादान से बड़ा कोई महादान नहीं है सरिता आगे कहती है कि वैसे तो हमारे शास्त्रों में कई तरह के दान का वर्णन है। कोई अन्नदान करता है तो कोई देहदान करता है कोई वस्त्रों का दान करता है तो कोई रक्तदान को महादान मानता है। हमारी सोसायटी में हम सभी को कई ऐसे दानवीर मिल जाएंगे जो किसी न किसी वजह से कुछ न कुछ दान करते है लेकिन आज के बाजारीकरण के दौर में जहां एजुकेशन कॉरपोरेट व‌र्ल्ड के हाथों में आ गई है। बड़े उद्योगपति अपने रुपयों को एजुकेशन सेक्टर में डालकर मोटी कमाई करने में जुटे हुए है। आज इन बच्चों को हमारी मदद की जरूरत है भीख मांगने वाले, कूड़ा बीनने वाले और अनाथ और बेसहारा बच्चों को। सरिता राय कहती है इसलिए मैंने निश्चय किया कि इन्हें रास्ते पर लेकर आऊंगी। यह संभव तभी हो सकती है जब समाज हमारा साथ दें आप लोग हमारा साथ दें। झुग्गी झोपड़ी में जाते वक्त उन लोगों के बीच रहने के बाद एहसास हुआ कि बिहार में प्रतिभाओं की कमी नही है बस उन्हें मौका मिलने की जरूरत है। सरिता राय अक्सर कई कार्यक्रमों को संबोधित करते हुए या किसी भी कार्यशाला में जब सम्मलित होती है तो लोगों को अक्सर कहती है हमें इंसानियत वाला बल्ब जलाने की जरूरत है। अब देश के हालात ऐसे हो गए कि बल्ब धीरे धीरे कम होने लगा और इसकी लौ कम होने लगी। उन्होंने कहा कि इंसानियत वाला बल्ब जलने की अभियान जैसा चलती है वो हर जगह कोशिस करती है कि लोग में जागरूकता हो।