आज़ादी के बाद से ही सहरसा उपेक्षाओं का शिकार रहा है

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राजनीतिक रूप से काफी उर्वर क्षेत्र हमेशा उपेक्षित

सहरसा पुरातनकाल से ही विद्वानों की भूमि रही है ।प्राचीन काल से यह स्थान आदि शंकराचार्य तथा यहाँ के प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ के लिए भी विख्यात रहा है।द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री बिहार  बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मस्थल भी सहरसा ही था ।यहाँ एक से बढ़कर एक शिक्षाविद् ने अपने जिले का मान एवं सम्मान पुरे राष्ट्र में बढ़ाया है । लेकिन आज से नहीं अपितु आज़ादी के बाद से ही सहरसा उपेक्षाओं का शिकार रहा है ।

सहरसा जिले के लोग अभी तक यह समझ नहीं पा रहे हैं कि राजनीतिक रूप से काफी उर्वर क्षेत्र हमेशा उपेक्षित क्यों रहा। जिले के राजनीतिज्ञों ने राज्य में अपनी धमक बनायी रखी लेकिन बात विकास की करें तो उपलब्धियां नगण्य नजर आती है। शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार जिसे किसी भी विकास के लिए मानक प्रारूप माना जाता है वह बिलकुल धराशायी हो चुका है । सहरसा जैसे जिले में अपना विश्वविद्यालय न होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । आज़ादी के 71 वर्ष बीत जाने के बाद भी सहरसा एक विश्वविद्यालय को तरस रहा है इससे ज़्यादा चिंतनीय विषय क्या हो सकता है । कॉलेज से संबंधित कोई भी कार्य हो तो वहाँ के विद्यार्थियों को शहर से दूर मधेपुरा का रुख करना पड़ता है । बहुत बड़े बड़े नेता हुए , बहुत बड़ी बड़ी घोषणाएं हुई और कुछ नहीं हुआ तो वो है सहरसा का विकास ।

दूसरी तरफ अगर हम स्वास्थ्य की बात करें तो सहरसा उसमें भी काफी पीछे नज़र आता है । खासकर स्वास्थ्य सेवा के मामले में स्थिति और भी खराब है. हाल के महीनों में थोड़ी स्थिति सुधरी है लेकिन गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोगों को बेहतर स्वास्थ सुविधा के लिए पटना, दरभंगा से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक जाना पड़ता है । आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के लिए बाहर जाकर इलाज कराना आसान है लेकिन कम व मध्यवर्गीय आय वाले लोगों के लिए आसान नहीं है । यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इतनी लचर एवं दयनीय है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते है । सरकारी अस्पताल के नाम पर सहरसा का सदर अस्पताल केवल एक ढांचा मात्र है जहाँ मरीज भी जाने से कतराते है । 1.55 लाख आबादी वाले जिले में न तो ढंग का कोई सरकारी अस्पताल है न ही सरकारी मेडिकल कॉलेज ।

वहीं वर्ष 2015-16 के केंद्रीय बजट में पटना के बाद दूसरे एम्स की शाखा खोलने की घोषणा की गयी थी । साल दर साल गुजर गए लेकिन इसके लिए न तो राज्य सरकार की तरफ से कोई पहल हुआ और न ही केंद्र सरकार की तरफ से पुरजोर कोशिश हुई । लोग इसे राजनीतिक साजिश के तहत दूसरे जगह स्थानांतरित करने की बात कर रहे हैं। जबकि एम्स निर्माण के लिए जितने भी मापदंड है , सहरसा जिले सभी मापदंडों पर खरा उतरता है। बात हवाई अड्डा की हो या रेलवे लाइन की या फिर जमीन उपलब्ध होने की बात सभी मापदंड पर यह खरा उतरता है। इसके बावजूद यहां एम्स की स्थापना नहीं होना इस क्षेत्र के लोगों के साथ नाइंसाफी होने के साथ ही जनप्रतिनिधियों के रवैये पर सवाल खड़े करेगा।

एम्स बनने से होगा कायाकल्प 

वर्षों से उपेक्षित सहरसा जिले में एम्स जैसे बड़े मेडिकल संस्थान खुलने से विकास के रास्ते खुलेंगे। इस क्षेत्र से लाखों की संख्या में मरीज इलाज के लिए महानगरों का रुख करते हैं। गंभीर बीमारियों की इलाज की सुविधा नहीं होने से उन्हें दिल्ली, मुंबई का रुख करना पड़ता है। इस क्षेत्र में गंभीर बीमारियों की बहुतायत है। एम्स जैसे सरकारी संस्थान के खुलने से लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधा होगी। एम्स निर्माण के लिए सहरसा जिले में जमीन की कोई कमी नहीं है। बीते अगस्त महीने में ही डीएम के द्वारा 217 एकड़ जमीन उपलब्ध होने की सूची राज्य के स्वास्थ्य विभाग को भेज दिया गया था।
अब आते है रोजगार जिसपे यहाँ की आर्थिक स्थिति का पता चलता है ।
मनरेगा योजना के तहत करोड़ों मानव दिवस सृजन करने वाले जिले से भी पेट की खातिर कमाने रोज परदेश मजदूर जा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं एक साल में रिकॉर्ड 38.16 करोड़ मानव दिवस सृजन कर जॉब कार्डधारियों को रोजगार उलब्ध कराने का दावा करने वाले सहरसा जिले की। वित्तीय वर्ष 2016-17 में सहरसा जिले ने 38.55 करोड़ के विरुद्ध 38 करोड़ 16 लाख 741 मानव दिवस सृजन किया। इसमें 19 लाख 28 हजार 299 महिला मानव दिवस सृजन कर जॉब कार्डधारियों को रोजगार उपलब्ध कराने का दावा किया जा रहा है।

विभाग का दावा है कि वर्ष 2016-17 में 64 करोड़ 38 लाख 21 हजार राशि मनरेगा योजना में खर्च की गई है। एक लाख 27 हजार 280 जॉब कार्डधारियों ने काम मांगा था। इसके विरुद्ध 93 हजार 516 को रोजगार उपलब्ध कराया गया। जिले में 9020 योजनाएं पूरी की गईं। 9250 योजनाएं अधूरी रह गईं हैं। 867 इंदिरा आवास के लाभार्थियों की जमीन पर मिट्टी भराई कार्य, 300 पीसीसी सड़क और 95 विकलांग व्यक्तियों को भी लाभान्वित करने की बात कही जा रही है।
बड़ा सवाल यह कि सहरसा जिले में करोड़ों मानव दिवस सृजन के बाद भी पेट की खातिर बड़ी संख्या में लोग पंजाब और हरियाणा राज्य क्यों जा रहे ? हालात यह कि सहरसा से अमृतसर जाने वाली जनसेवा एक्सप्रेस रोज मजदूर यात्रियों की भीड़ से ठसी रहती है। कोसी और सीमांचल क्षेत्र के 15 हजार से अधिक मजदूर यात्रियों की भीड़ से रेलवे की टिकट बिक्री से राजस्व 30 लाख के ऊपर चला जाता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सहरसा को अभी विकास के पटरी पर लाने की , जरुरत है सरकार को आगाह करने की जो वहाँ की युवा जनता भलीभाँति कर रही है । नेता आते रहेंगे और जाते रहेंगे अगर कुछ स्थायी रहेगा तो वो है जिला सहरसा ।

(@अभिनव नारायण झा/दिल्ली से यह आलेख koshixpress के साथ शेयर किए है।यह लेेेखक का अपना विचार है)