एम्स आंदोलन क्यों नहीं बन पाया जनांदोलन ?

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युवा वक्ता एवं पत्रकारिता के छात्र सोमू आनंद ने बेबाक लहजे में अपने फेसबुक पेज पर लिखा की आखिर एम्स जनांदोलन क्यों नही बन सका । आप भी पढ़ लीजिए…

सहरसा में एम्स की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है। अलग-अलग संगठनों के बैनर तले लोग अनशन कर रहे हैं। लेकिन पिछले 3 साल से जारी इस आंदोलन को जनता का समर्थन नहीं मिल पाया है।हरसा में एम्स की कहानी 2015 से शुरू होती है। अपने पहले बजट में केंद्र सरकार ने बिहार में दूसरे एम्स खोलने की बात कही। इसके कुछ ही घण्टे बाद भाजपा नेता सह अधिवक्ता बिनोद झा ने सहरसा में एम्स की मांग करते हुए एक पोस्ट किया। उसी पोस्ट पर कमेंट करते हुए लोगों ने आंदोलन की रूपरेखा तैयार की। बिनोद झा की इस मांग को सहारा मिला सहरसा के अनशनकारी नेता प्रवीण आनंद का। इन दोनों के बीच क्या बात हुई यह नहीं पता लेकिन आनन-फानन में एक संगठन बन गया। बिनोद झा प्रमंडलीय अध्यक्ष बने और प्रवीण आनंद संरक्षक।

यह सब कुछ शुरू हुआ बिहार विधानसभा चुनाव से करीब 6 महीने पहले। दरअसल, उस समय बिनोद झा जी भाजपा से सहरसा विधानसभा का टिकट लेने का ख्याली पुलाव पका रहे थे तो प्रवीण आनंद महिषी विधानसभा का ख्वाब देख रहे थे।

जून 2015 में युवाओं को इस अभियान से जोड़ने के लिए राहुल झा, रौशन कुंवर ने संजय पार्क में एक बैठक की, उसके बाद इस टोली ने खूब काम किया और गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। हालाँकि यह सिलसिला ज़्यादा दिन चला नहीं।

उस समय भाजपा विपक्ष में थी और स्थानीय भाजपा नेताओं ने इसे खूब भुनाया। भाजपा के दोनों पूर्व विधायक, जिलाध्यक्ष ने भी बैठकों में हिस्सा लिया। पूर्व विधायक आलोक रंजन ने जेपी नड्डा से भेंट कर पत्र सौंपा। जिला पार्षद द्वय रितेश रंजन, प्रवीण आनंद ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की। विधायक दिनेश चंद्र यादव ने विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया। इस दौरान सहरसा आने वाले तमाम केंद्रीय मंत्री ने सहरसा में एम्स खोलने की प्रतिबद्धता जताई। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात।
आजकल एक नवोदित नेता, पूर्व बीडीओ गौतम कृष्ण अनशन पर बैठे हैं। उनके कार्यक्रम में जो बैनर लगा है उसमें एम्स का तो पता नहीं लेकिन उनकी बड़ी सी तस्वीर जरूर दिखाई देती है। मालूम हो कि बीडीओ साहब की मंशा आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने की है।
इस बीच कई सामाजिक संगठनों ने एम्स को लेकर छोटे-छोटे प्रदर्शन किये। लेकिन अधिकांश आंदोलन अखबारी ही साबित हुए। बैनर पर अपनी बड़ी सी तस्वीर डाल दर्जनों आंदोलन हुए लेकिन उसमें आमजन की भागीदारी नहीं हुई।

क्योंकि एम्स सहरसा की समस्या नहीं है।सहरसा की समस्या नारकीय जाम है। 4 बार शिलान्यास के बावजूद कई मौत का गवाह बन चुका बंगाली बाजार ढाले का ओवरब्रिज है। सदर अस्पताल की बदहाल व्यवस्था है। क्योंकि लोग एम्स में सर्दी खांसी के इलाज के नहीं जाएंगे। किसी बाइक की ठोकर से चोट लगने पर या खून बह जाने पर कोई एम्स नहीं जाएगा। सहरसा में बढ़ता हुआ अपराध है। डीबी रोड की संकरी सड़क की बैरिकेडिंग है। जो बदसूरत से इस शहर को बद से बदसूरत बनाती है और सबसे बड़ी समस्या जलजमाव है। जब 4-4 महीने लोग अपने घरों में तटबंध के अंदर जैसा जीवन बिताते हैं। सहरसा को पहले इन समस्याओं से छुटकारा चाहिए। एम्स रोजमर्रा की जरूरत नहीं है। यह समस्याएं रोज की समस्या है।

हाँ! एम्स बनने से फायदा होगा लेकिन इसके लिए लोगों को जोड़ना होगा। लगभग चार साल के आंदोलन की सामुहिक विफलता यही है कि इससे लोग नहीं जुड़ पाए। आंदोलनकारियों की मंशा संदेह के घेरे में है। क्योंकि जब भी इनसे सवाल किया जाता है या इनसे असहमति जताई जाती है तो इनका व्यवहार जानवरों के मानिंद हो जाता है।
हालांकि अब कुछ भी करने से एम्स सहरसा में नहीं बनने वाला क्योंकि इसके लिए राज्य सरकार ने दरभंगा का चयन कर लिया है। फिर भी अगर आप इसके लिए गंभीर हैं तो अपनी तस्वीर को किनारे कर सहरसा के आमलोगों को इससे जोड़िए…. एम्स न भी बने तो एक बेहतर सहरसा जरूर बन जायेगा…