पति की दीर्घायु के लिए’ नवविवाहिता’ अपने मायके में रहकर मानती है’ मधुश्रावणी पर्व

दिनेश सिंह
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पति की दीर्घायु के लिए नवविवाहिता मानती है मधुश्रावणी पर्व
– नवविवाहिता अपने मायके में रहकर मानती है मधुश्रावणी पर्व
-पर्व के दौरान ससुराल का ही अन्न खाती है व्रती
– नव दंपति का मधुमास कहलाती है मधुश्रावणी
 
खजौली। निज प्रतिनिधि

(पारस कुमार ठाकुर  की कलम से)

मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल की अनेक सांस्कृतिक विशिष्टताओं में एक है। मिथिलांचल में नव विवाहिताओं द्वारा की जाने वाला यह व्रत अपने सुहाग की रक्षा की कामना के साथ किया जाता है। नागपंचमी से शुरू होकर
यह पर्व टेमी के साथ संपन्न हो जायेगा। इस पर्व में गौरी-शंकर की पूजा तो होती ही है साथ में विषहरी व नागिन की पूजा होती है। इस पर्व को नवदम्पत्तियों का मधुमास कहा जाता है। इस पर्व के दौरान नव विवाहिताएं ससुराल के दिये कपड़े-गहने ही पहनती है। यहां तक कि 15 दिनों तक भोजन भी ससुराल से भेजे गए भोजन सामग्री का ही करती है।

खास तौर पर नव विवाहिता इस पर्व को अपने मायके में रहकर ही मानती है। विवाहिता पर्व के दौरान प्रतिदिन गौरी, चनाय एवं विषहारा नाग देवता की पूजा के बाद कथा सुनाने वाली महिला कथा सुनाती है। जिसमे शंकर-पार्वती के चरित्र के माध्यम से पति-पत्नी के बीच होने वाली बाते जैसे नोक-झोंक, रूठना मनाना, प्यार, मनुहार जैसे कई चरित्रों के जन्म, अभिशाप, अंत इत्यादि की कथा सुनाई जाती है, ताकि नव दंपती इन परिस्थितियों में धैर्य रखकर सुखमय जीवन बिताये । यह मानकर कि यह सब दांपत्य जीवन के स्वाभाविक लक्षण हैं। तेरह दिनों तक यह क्रम चलता रहता है फिर अंतिम दिन बृहद पूजा होती है। इस दिन टेमी दागने की प्रथा है। टेमी दागने के क्रम में महिलाओं द्वारा नवविवाहिता के दोनों पैर व घुटनों को एक जलती हुई दीये की बाती यानी टेमी से दागा जाता है। ऐसा मानना है कि तीन फफोले उगने से लड़की को भागयशाली माना जाता है। पंद्रह दिनों के रीति-रिवाज भावपूर्ण गीत एवं सामाजिक मेल-मिलाप के बाद नव दंपत्ति विभिन्न तरह के अनुभवों के साथ अपनी जीवन यात्रा पर मजबूत कदमों के साथ चल पड़ते हैं। मैथिली गीत गाते हुए फूल तोड़ने बाग-बगीचा जाती हैं। नवविवाहिता जब नवविवाहिता सज-धज कर फूल लोढ़ने के लिए बाग-बगीचे में सखियों संग निकलती हैं तब घर-आंगन बाग-बगीचा, खेत-खलिहान व मंदिर परिसर में इनकी पायलों की झंकार व मैथिली गीतों से माहौल मनमोहक हो जाता है। जब अपने मायके व ससुराल से नवविवाहिता की टोली निकलती है तो उनका रूप, श्रृंगार, गीत और सहेलियों में प्रेम देखते ही लगता है कि शायद इंद्रलोक यहीं पर है।बता दें कि नवविवाहिताएं इस पर्व को अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए करती हैं।