विरोध का साहित्य है भोजपुरी साहित्य : ब्रज भूषण मिश्र

Kunal Kishor
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भोजपुरी में बिना किसी लाभ के हजारों छोटे बड़े लेखक रचना कर रहे
डेस्क :भोजपुरी साहित्य मुख्यतः विरोध का साहित्य है। ये भारतीय आजादी के समय मुखर रूप से सामने आई। लेकिन आजादी के बाद भोजपुरी के लेखन में उस तरह से स्वर का अभाव रहा।ये बातें भोजपुरी – हिंदी के प्रसिद्ध लेखक डॉ. ब्रज भूषण मिश्र ने प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक द्वारा आयोजित एंव श्री सीमेंट द्वारा प्रायोजित आखर नामक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान कही।
प्रखर पत्रकार निराला बिदेसिया से बातचीत में भोजपुरी भाषा साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश पड़ा।
डॉ. ब्रज भूषण मिश्र ने कहा कि भोजपुरी में कई काम हुए है।  गणेश चौबे जैसे लेखक ने इस भाषा में कई काम लिए लेकिन वो बातें बाहर नहीं आ पाई जिसकी अब जरूरत है।
बातचीत के क्रम में डॉ. ब्रज भूषण मिश्र ने कहा कि भोजपुरी का विकास यहां के लोग से ज्यादा बाहर गए मजदूर, बाहर विदेशी देश मे रह रहे लोगों ने की। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि नेपाल के मधेशी नेता लोग नेपाली भाषा में शपथ लिए । भोजपुरी में बिना किसी लाभ के हजारों छोटे बड़े लेखक रचना कर रहे हैं।
एक प्रश्न के उत्तर में भगवती प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा कि हीरा डोम, राहुल सांकृत्यायन, भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिश्र, रघुवीर नारायण, गणेश चौबे जैसे कई लेखकों ने भोजपुरी साहित्य की मजबूत नींव रखी है।
भोजपुरी के अष्टम अनुसूची में शामिल करने के सवाल पर कहा ये राजनीतिक मुद्दा है और राजीनीतिक रूप से जबतक भोजपुरी वासी संगठित नहीं होंगे तबतक उन्हें ये नहीं मिलेगा। 
इस पर पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि भोजपुरी को अष्टम अनुसूची से ज्यादा साहित्य अकादमी में स्थान मिले इसके लिए काम करना चाहिए, जैसे नेपाली और संथाली छोटे क्षेत्रीय भाषा ने अपना मुकाम बना लिया है।
इस अवसर पर पद्मश्री उषाकिरण खान, हृषिकेश सुलभ, प्रो.ब्रजकिशोर, विनोद अनुपम, शिवदयाल जी, यशवंत मिश्र, आराधना प्रधान और आदि लोग मौजूद थे।