दीपक से रोशन करने वाले के जीवन में छाया अंधेरा,प्लास्टिक युग में रोटी की समस्या से जूझते कुम्हार !

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मुकेश कुमार मिश्र : आधुनिक युग में प्लास्टिक के तरह-तरह के डिजिाइनो वाले छोटे -छोटे बर्तनों का निर्माण किए जाने से मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग सिमटता जा रहा हैं।जिससे कुम्हार जाती के पुश्तैनी धंधे में लिप्त कारीगरों के जीवन में अंधेरा छाने लगा है। दीपावली के मौके पर कुम्हारों द्वारा दीप,प्याला,घडा आदि कम मात्रा में निर्माण कर रहे हैं।koshixpress

मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी जीविका का निर्वाह करने वाले प्लास्टिक युग में रोटी की समस्या से जुझ रहे हैं।कई कुम्हार जाती के लोग अपने पुश्तैनी धंधे को छोड़ दुसरे व्यवसाय को अपना चुके हैं। खगड़िया जिले के परवत्ता निवासी अर्जुन पंडित बताते हैं कि पहले मुफ्त में मिट्टी उपलब्ध हो जाता था। अब आठ सौ रुपए टेलर मिट्टी खरीदना पडता है।उसके बाद भी  समय पर  मिट्टी के बनाने हुए समान नहीं बिक पाता है।क्योंकि लोग प्लास्टिक के बने बर्तन का उपयोग करने लगा है।मिट्टी के मूल्यों में लगातार वृद्धि,कच्ची सामग्री को अग्नि में पकाने के लिए अत्यधिक खर्च करना पड़ता है। जिस कारण से पहले कि अपेक्षा मिट्टी के बर्तन कुछ मंहगी हुई हैं।

विषम प्रतिस्पर्धा में भी जिले सहित प्रखंडो  के कई कुम्हार अपने पुश्तैनी धंधे अपनाए हुए हैं।आज से एक दशक पूर्व दीपावली के पहले कुम्हार के चेहरों पर दिखने वाली खुशी मायूसी में बदल गई हैं।एक समय था जब दीपावली के मौके पर परवत्ता से मिट्टी के बनाए हुए दीपक अन्य जिलों में भेजा जाता था।उदपुर,परवत्ता,मोजाहिदा,रुपोहली,राका,खीराडीह ,कोलवारा,महद्दीपुर,आदि गांव कुम्हार जाती के लोग काफी संख्या में निवास करते हैं। ओर दीपावली के मौके पर मिट्टी के दीया बनाते थे। जो आज एक्का दुक्का परिवार अपनी पुश्तैनी धंधे को बरकरार रखे हैं।

दीपक से रोशन करने वाले कुम्हार जाती के लोगों का जीवन अंधकार में हैं। बाजारों में चेनीज समान की बिक्री जोरों पर हैं। बदलते जमाने ने पुराने समाजिक संरचना को भूल रहे हैं।