अर्धरात्रि में होती है निशा पूजा,पूजन का है विशेष महत्व !

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कुणाल किशोर /मुकेश कुमार मिश्र : मंदिर में नारियल-फल-फूल आदि की भेंट चढ़ती हुई आपने जरूर देखी होगी या सुनी भी होगी। लेकिन इस देश में मंदिरों में देवी को प्रसाद के रूप में शराब चढ़ाई जाती है। जी हां-वैसे तो अक्सर शराब का चढ़ावा तो काल भैरव को चढ़ाने की मान्यता है लेकिन यहां तो रिवाज एकदम उलट है। ऐसा गजब होता है और वो भी नवरात्र में देवी मां के मंदिर में माता को मदिरा चढ़ाई जाती है।लेकिन पूर्व के वर्षो के भांति अब बगैर मदिरा के ही काल रात्रि की पूजा बिहार में होगी |बिहार सरकार द्वारा बिहार में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है |ऐसे में निशा पूजा बगैर मदिरा चढाये की जाएगी |koshixpress
देखने मात्र से मिलती है माँ की कृपा
दुर्गा माँ के मंदिर में प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्र के दौरान किये जाने वाले निशा पूजन का एक अलग ही महत्व है।माँ शक्ति के सातवें रुप को कालरात्रि के रुप में जाना जाता है।सप्तमी को माँ का महास्नान कराया जाता है।इसी दिन रात में निशा पूजा का आयोजन होता है।मंदिर के मुख्य पुजारी के देख रेख में निशा पूजा का आयोजन किया जाता है।
पूजा का महत्व 
इस पूजन में अन्य धार्मिक क्रिया कलापों के अलावा गांव के एक परिवार विशेष द्वारा दी गयी बलि से इसकी शुरुआत होती है।इसमें काले कबूतर व काले छागड़ की बलि दी जाती है।इस पूजा की शुरुआत बारह बजे रात में होती है,जो अगले दो घंटे तक चलती है।ऐसी मान्यता है कि इस पूजन को देखने मात्र से मनोकामनाएँ पूर्ण होती है तथा माँ का आशीर्वाद मिलता है।इस पूजा को देखने के लिये प्रतिवर्ष काफी संख्या में श्रद्धालू मंदिर में जुटते हैं।ऐसी मान्यता है कि माँ जिस भक्त पर प्रसन्न होती हैं उसे ही निशा पूजा देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है।जिन पर माँ की कृपा नहीं होती है, वे पूजा शुरु होने तक स्वयं को रोक नहीं सकते हैं और निद्रा के आगोश में चले जाते हैं।koshixpress
प्रसाद लेकर बिना रुके जाना पड़ता है घर
पूजा के समापन पर भक्तों को प्रसाद दिया जाता है। इस प्रसाद को प्राप्त करने वालों को उसी समय बिना रुके अपने घर जाना पड़ता है तथा उसे प्रसाद देना पड़ता है जिसके लिये मन्नत माँगी गयी है।निशा पूजा देखने एवं प्रसाद प्राप्त करने के चमत्कारिक परिणामों के दर्जनों किस्से इलाके के लोगों के जुबान पर है।इस नवरात्र को लेकर पूरे जिले में रामायण पाठ होता है।बड़ी संख्या में लोग फलाहार व्रत रखते हैं।वहीं कुछ लोग केवल जल पर ही दसों दिन अपना काम चलाते हैं तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं।सिराजपुर,तेमथा राका,खनुआ राका, चकप्रयाग,लगार,कुल्हरिया,मड़ैया, भरतखंड आदि गांवों में पहली पूजा से ही मेला का माहौल लगने लगता है।वहीं डुमड़िया बुजुर्ग तथा परबत्ता गांव में प्रतिमा की बजाय कलश स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है।प्रखंड में चारों ओर भक्ति,समर्पण, आराधना एवं सात्विकता का माहौल बना हुआ है।सभी पूजा समितियों द्वारा भक्तों की सुविधा के लिये तरह तरह के इंतजाम किये गये हैं।