संतान प्राप्ति के लिए विख्यात हैं गंगा तट पर अवस्थित बिशौनी की चतुर्भुजी दुर्गा !

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मुकेश कुमार मिश्र :गंगा तट पर अवस्थित हें बिशौनी की चार भुजावाली आदिशक्ति मूल प्रकृति स्वरूपा माँ दुर्गा तेरे दर पे भक्त गण खाली हाथ आते हैं और झोली भरकर जाते हैं, कोई बात तो है माँ तुम्हारे दर्शन में तभी तो लाखों भक्त शिश झुकाते हैं |

संतान प्राप्ति के लिए विख्यात हैं बिशौनी की चतुर्भुजी दुर्गा

बिहार के खगडिया जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर पर अवस्थित बिशौनी की चार भुजावाली माँ दुर्गा संतान प्राप्ति के लिए इलाके में विख्यात हैं। दर्जनों महिलाओं की सुनी गोद माँ के आशीर्वाद से भर गई हैं। शारदीय नवरात्रा में भक्तों का जनसैलाव उमड पड़ी है। आमतौर पर शारदीय नवरात्रा में सभी दुर्गा मंदिर में आठ से दस भुजा वाली माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाकर पूजा अर्चना करते हैं। लेकिन बिशौनी एवं नयागांव में सदियों से चार भुजावाली माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाकर पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।koshixpress

मूल प्रकृति स्वरूप है चार भुजावाली माँ दुर्गा

श्री शिव शक्ति योगपीठाधीश्वर परमहंस स्वामी आगमानंद जी महाराज कहते हैं कि महा लक्ष्मी,सरस्वती स्वरूप हैं चार भुजा वाली माँ दुर्गा का मूल प्रकृति स्वरूप है। इसी मूल प्रकृति स्वरूप से ही अष्ट, दस आदि भुजा वाली नाम से विकसित हुआ है। मूल प्रकृति स्वरूप चतुर्भुजी दुर्गा की पूजा करने से सभी बाधाएँ दुर होती हैं। तथा मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

साग एवं बगिया का लगता हैं भोग

जब माँ दुर्गा  पिंडी पर विराजमान हो जाती हैं तो सुबह शाम साग एवं चावल की बगिया का भोग लगाया जाता हैं। ग्रामीण बताते हैं कि कई सौ वर्षों पूर्व बार बार बाढ़ कि विभीषिका से लोग तंग आ चुके थे।मंदिर के पंडित एवं ग्रामीणों ने माँ से विनती किया कि माँ हमलोग  बाढ़ से तंग आ चुके हैं मेरी आर्थिक स्थिति दयनीय हैं अब सेवा करने के लिए असमर्थ हूँ। यह कहकर भक्त गणो ने निर्णय लिया कि अगले वर्ष शारदीय नवरात्रा में पूजा पाठ नहीं होगी। विजयादशमी के दिन प्रतिमा के साथ मेढ को भी गंगा में विसर्जित कर दिया गया। अगले वर्ष शारदीय नवरात्रा के कुछ दिन पूर्व माँ दुर्गा ने मंदिर के पंडित को स्वप्न दिया,तुम जो प्रतिदिन भोजन ग्रहण करते हो उसी से मेरा भोग लगाओ। तुमलोगो की भक्ति भावना से प्रसन्न हूँ। पुनः पूजा प्रारंभ हुआ तथा उसी दिन से साग एवं बगिया का भोग लगाया जाता हैं।koshixpress

अंग्रेज भी मंदिर में टेकते थे माथा

लगातार 27 वर्षों से चतुर्भुजी  माँ दुर्गा की सेवा करते आ रहे खजरैठा निवासी डा० प्राण मोहन कुंवर बताते हैं कि ब्रिटिश शासन काल में एक अंग्रेज अधिकारी को संतान नही था। माँ के दरबार में माथा टेका और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुआ। फलस्वरूप कई वर्षों तक शारदीय नवरात्रा में मंदिर आकर माथा टेकते थे। माँ के आशीर्वाद से बिशौनी के कई भक्त गण विभिन्न विभिन्न क्षेत्रों में उच्च पदों पर पहुंच कर  गांव एवं जिले का नाम रोशन किया है। माँ दुर्गा सभी की मन्नतें पूर्ण करती हैं।

निशा पूजा का विशेष महत्व

बिशौनी दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्रा के दौरान पूजा विधि विधान की तौर तरीके इलाके में चर्चित है।पूजा की प्राथमिकता को लेकर यह मंदिर जिले में विख्यात हैं। सप्तमी की रात्रि में निशा पूजन किया जाता हैं। बारह बजे रात्रि से पूजा प्रारंभ होती हैं। जो लगभग दो घंटे चलती हैं। इस पूजन को देखने के लिए काफी संख्या में भक्त मंदिर में जमे रहते हैं। एेसी मान्यता है कि भाग्यशाली भक्त ही निशा पूजन देख पाते हैं। जिनपर माँ की कृपा नहीं होती हैं वे निन्द्रा के आगोश में चले जाते हैं। निशा पूजा में काला कबूतर एवं काला छागर की बलि दी जाती हैं। 

आस्था का सैलाब उमड़ता हैं प्रतिवर्ष / मंदिर का आकार भी चतुर्भुज

शारदीय नवरात्रा में सुबह शाम भक्त जनो की काफी भीड़ उमड़ती हैं।दूर  दराज से प्रतिदिन भक्त गण आते हैं।मन्नतें मांगने वाले भक्तों की भीड़ लगी रहती हैं। बिशौनी दुर्गा मंदिर का आकार भी चतुर्भुज हैं। बिशौनी की चतुर्भुजी दुर्गा अति प्राचीन सिद्धि पीठ के रुप में पूजीं  जाती। पंडित गण का कहना है कि बिहार में मात्र दो स्थान बिशौनी एवं नयागांव सतखुट्टी में ही  शारदीय नवरात्रा में चार भुजावाली  माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाकर सदियों से पूजा की जा रही हैं।मंदिर के आचार्य उत्कर्ष गौतम उर्फ रिंकु झा ने बताया कि माँ की महिमा अगम अपार है। चतुर्भुजी दुर्गा सुख, शांति एवं समृद्धि का प्रतीक है। माँ दुर्गा सभी की मन्नतें पूर्ण करती हैं। (फाइल फोटो सभी )