अस्तित्व खो रहे तालाब और पोखर, जल स्तर संकट में बढोतरी की आशंका !

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खगङिया (मुकेश कुमार मिश्र ) : परबत्ता प्रखंड में विगत तीन दशकों में तालाब/पोखरों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है।हलाँकि तीन तरफ से गंगा नदी से घिरा होने के कारण परबत्ता प्रखंड अपने भौगोलिक बनावट के कारण पोखर/तालाब के लिये अनुकूल नहीं है।प्रखंड के आधे भूभाग में पाँच से दस फीट की गहराई पर सफेद बालू निकल जाता है।इस कारण किसी भी गड्ढे या पोखर का सीधा संबंध गंगा नदी से हो जाता है।इसका परिणाम है कि गंगा के जलस्तर में बढोतरी से परबत्ता प्रखंड के सभी पोखर पानी से लबालब भर जाता है।जबकि जलस्तर में गिरावट से सभी तालाब सूख जाते हैं।
इस भौगोलिक कठिनाई के बावजूद प्रखंड में बन्देहरा, महदीपुर,कोलवारा,परबत्ता,कन्हैयाचक आदि गांवों में पोखर/तालाब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।हलाँकि वैसा,मड़ैया, अररिया,कुल्हरिया तथा सलारपुर से उत्तर जितने गांव हैं उसमें इस प्रकार की भौगोलिक कठिनाईयाँ कम हैं।किंतु सिंचाई से लेकर पेयजल के लिये मशीनों,बोरिंगों तथा चापानल पर बढती निर्भरता ने इन पोखरों को उपेक्षित कर दिया है।प्रखंड मुख्यालय स्थित परबत्ता गांव में पुराने जमींदारों के हाथी के लिये बनाये गये पोखर को विगत दो दशकों से लोगों द्वारा चारों ओर से भर कर आवासीय उपयोग किया जा रहा है।पोखरों की उपेक्षा का यह आलम है कि लोगों द्वारा लोगों द्वारा कई प्रकार से इसे समाप्त किया जा रहा है।आमलोग अभी तक पोखर/तालाबों को कपड़े धोने,मवेशी को नहलाने मात्र का साधन मानते हैं।
आमलोग भूगर्भीय जल संरक्षण के विषय में जागरुकता के अभाव में ज्यादा नहीं सोचते हैं।आम लोग पोखरों से होने वाले फायदे पर चर्चा करते समय भी इसके व्यावसायिक उपयोग से अलग अन्य बातों की ओर ध्यान नहीं देते।सरकार द्वारा भूगर्भीय जल के गिरते स्तर को सुधारने को लेकर निजी भूमि पर मनरेगा जैसी योजनाओं से पोखर निर्माण की योजना शुरु किया जा रहा है। इसमें भूमि के मालिक को मछली पालन तथा पौधारोपण का लाभ दिये जाने की बात कही जा रही है।किन्तु उपजाऊ भुमि होने के कारण इसके सफलता के प्रति उदासीनता देखी जाती है।जबकि इसके अलावा प्रखंड की भौगोलिक बनावट के कारण भी इसकी सफलता यहाँ संदिग्ध है।गोगरी नारायणपुर बाँध से तीन ओर से घिरे इस प्रखंड में वर्ष में लगभग छ: महीने एक पतली सी धारा डुमड़िया खुर्द,अररिया,बिठला,कुल्हरिया तथा बिशौनी सलारपुर गांव के निकट से बहती है।
जिसे जल संसाधन विभाग के द्वारा बिशौनी गांव के निकट बाँध में स्लुईस गेट बनाकर गंगा में मिलने का रास्ता बनाया गया है।इस जल का भी सदुपयोग नहीं हो पाता है।जल संरक्षण के स्रोत के प्रति सरकारी उदासीनता तथा लोगों में जागरुकता का अभाव का दुष्परिणाम अब दिखने लगा है।तालाब/पोखर के साथ साथ इलाके में कुआँ के उपयोग के प्रति भी लोगों में उपेक्षा का भाव बढा है।