खेती-बाड़ी बनी बोझ,पलायन कर रहे किसान !

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मुकेश कुमार मिश्र : खगड़िया जिले के परबत्ता प्रखंड में बहुसंख्यक जनसंख्या की आजीविका का मुख्य साधन खेती बाड़ी अब किसानों के लिये बोझ बनती जा रही है।खेती की बढती लागत मूल्य, उपज के भंडारण की समुचित सुविधा का अभाव,फसल कटाई के समय अल्प कीमत में खाद्यान्न की खरीददारी, सरकारी क्रय का सुविधाजनक नहीं होना इसमें मुख्य कारण माना जाता है। प्रखंड के मुख्य रुप से गेंहूँ,मकई,केला, दलहन तथा तिलहन की खेती की जाती है।इन फसलों में भी गेंहूँ,मकई तथा केला की खेती सर्वाधिक मात्रा में की जाती है।koshixpress
जानकार बताते हैं कि इस वर्ष विगत साल की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत भुमि पर ही मकई की खेती की जा रही है।इसका मुख्य कारण मक्के के गिरे हुए मूल्य में कमी को माना जाता है।मक्के के गिरे हुए कीमत तथा खेती के बढते लागत के कारण मक्का खेती के बारे में  लोगों की रुचि घट रही है।मक्का की खेती का लागत मूल्य अब बढकर 15 से 17 हजार रुपये प्रति बीघा तक पहुँच गया है जबकि फसल तैयार होने के समय इसका खरीद मूल्य 8 सौ से 9 सौ रुपये प्रति क्विंटल तक हो जाता है। इस कारण से अब मक्का की खेती घाटे का सौदा बन गया है।केन्द्र सरकार द्वारा विगत वर्ष मक्का की सरकारी खरीद करने की घोषणा का हश्र किसान देख चुके हैं।koshixpress
गेंहूँ की खेती का भी कमोबेश यही हाल है।प्रत्येक वर्ष बुआई का समय समय समाप्त होने पर ही सरकारी स्तर पर बीज के वितरण की व्यवस्था हो पाती है।तबतक अधिकांश किसान मँहगे दर पर निजी कंपनियों के बीज को खरीदना पड़ता है।पटवन के लिये भी डीजल चालित पम्पसेट पर किसानों की निर्भरता भी खेती की लागत खर्च को बढा देता है।प्रखंड के अधिकांश सरकारी नलकूप बंद या खराब पड़े हैं। जिस किसान के पास अपना बोरिंग या पम्पसेट नहीं है उन्हें 150 रुपये प्रति घंटे की दर से पटवन का पानी खरीदना पड़ता है।इसके अलावा किसानों को बैंक से आसान ब्याज दर पर कृषि ऋण प्राप्त करने की राह में दलाली तथा दुरुह कागजी प्रक्रिया एक रोड़ा बन जाती है। इस कारण से किसान ग्रामीण महाजन के चंगुल में फंस रहे हैं।इस ऋण चक्र में उलझने के कारण किसान कृषि को छोड़कर मजदूरी आदि के लिये राज्य से बाहर जाने को विवश हो रहे हैं।
प्रखंड में कृषि उत्पाद के लिये कोई सरकारी व्यवस्था नहीं रहने के कारण किसानों को साहूकारों के हाथों में औने पौने दाम पर अपने कृषि को बेचना पड़ता है। सरकार के द्वारा पैक्सों को धान खरीदने का लक्ष्य दिया जाता है।हलाँकि प्रखंड में धान का उत्पादन केवल उत्तरी भाग में आंशिक रुप से होता है।पैक्सों द्वारा सरकार से मिले इस लक्ष्य की पूर्ति के लिये पड़ोस के जिलों से धान की खरीद की जाती है।बहरहाल प्रखंड में खेती करने वाले किसान नित्यानंद दास, अमित कुमार,सदानन्द यादव,अरुण दास आदि ने बताया कि किसानों की समस्या को दूर किये बिना प्रखंड,राज्य या देश का विकास संभव नहीं है। निर्धारित मूल्य पर खाद-बीज-पानी की व्यवस्था तथा समर्थन मूल्य पर तैयार फसल की खरीद की व्यवस्था सुनिश्चित करने से किसानों को राहत मिल सकती है।