चरखा दिवस : फिर से गूँज रहा चरखा का संगीत,गांव की महिलायें हो रही हैं आत्मनिर्भर !

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मुकेश कुमार मिश्र : स्वतंत्रता आन्दोलन का गवाह रहा खादी का अपना अलग ही इतिहास है। विगत कुछ दशकों में खादी का आन्दोलन घीमा पड़ता चला गया। विगत के काल खंड में खगड़िया जिले के परवत्ता प्रखंड में चरखा का स्वर मद्धिम पड़ गया और इससे जुड़े लोग धीरे धीरे अन्य पेशे से जुड़ते चले गये।अब एक महिला के साहसिक पहल से फिर से एक बार प्रखंड के सियादतपुर अगुवानी पंचायत अंतर्गत डुमड़िया बुजुर्ग गांव स्थित खादी भंडार के प्रांगण में चरखा का संगीत गूँजने लगा है।
एक महिला ने आरंभ किया अभियान
सियादतपुर अगुवानी पंचायत अंतर्गत डुमड़िया बुजुर्ग गांव में दशकों से एक समृद्ध खादी भंडार का वजूद है।एक समय में यह गांव की महिलाओं के लिये आत्मनिर्भरता का एक जीता जागता उपक्रम था।आजादी के बाद खादी का आन्दोलन धीरे धीरे शिथिल पड़ता चला गया।विगत कुछ वर्षों में डुमड़िया की इन्दु देवी ने फिर से अकेले इसे शुरु किया।सुलतानगंज के खादी भंडार से पोनी लेकर आये कर्मियों ने चरखा को फिर से चालू करना शुरु किया।धीरे धीरे गांव की अन्य महिलायें भी इससे जुड़ती चली गयी।अब करीब दो दर्जन महिलायें नियमित रूप से चरखा पर सूत कातती हैं।koshixpress
आजादी में थी चरखे की अहम् भुमिका
प्रखंड में आजादी के आन्दोलन के दौरान चरखा की अहम् भुमिका रही थी। अमूमन सभी जागरुक घरों के पुरुष स्वतंत्रता संग्राम में व्यस्त रहते थे और घर की महिलायें चरखा कात कर अपने घर का संचालन करती थी।चरखा न केवल आत्मनिर्भर होने में सहयोग करता था,बल्कि देश को भी विदेशी कपड़ों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंग्रेजी कब्जे से मुक्ति का माध्यम भी था।
करोड़ों की सम्पत्ति हो रही खाक
प्रखंड में डुमड़िया बुजुर्ग,कन्हैयाचक, कवेला,डुमड़िया खुर्द,माधवपुर आदि गांवों में समृद्ध खादी भंडार हुआ करता था।गांव की महिलायें अपने घरेलू कार्य से मुक्त होने पर इन भंडारों में चरखा कात कर अपना तथा परिवार का भरण पोषण करती थी।विगत कुछ दशकों में खादी भंडार धीरे धीरे निष्क्रिय हो गया। इसके साथ ही खादी भंडार का लाखों रुपयों का मकान तथा करोड़ों रुपये की जमीन मिट्टी में मिल रहा है।koshixpress
फिर से आत्मनिर्भर हो रही महिलाएँ
अब विगत कुछ वर्षों से इस चरखा के माध्यम से गांव की महिलायें फिर से आत्मनिर्भर हो रही हैं।खादी भंडार में अलसायी दोपहर को चरखा कात रही पसीने से तर ब तर महिलाओं ने बताया कि उन्हें सुलतानगंज के खादी भंडार से लोग आकर पोनी दे जाते हैं तथा अगले दिन तौल कर सूत वापस ले जाते हैं।सूत कातने की मजदूरी के रुप में डेढ सौ रुपये प्रति किलो की राशि दी जाती है। एक महिला एक दिन में लगभग एक किलो सूत को कात लेती हैं।फिलहाल यहाँ राजकोट चरखा से सूतों की कतायी की जाती है।इन महिलाओं को यह चरखा भी सुलतानगंज के खादी भंडार द्वारा ही उपलब्ध कराया गया है।
गांव की रूपकला देवी,सुगनी देवी,रेणू देवी,लीला देवी,मीना देवी,गुंजन देवी, जोगा देवी, अंजनी देवी,कजोमा देवी समेत कई अन्य महिलायें भी नियमित रुप से सूत कातती हैं।इस श्रमसाध्य कार्य के बावजूद महिलायें इस कार्य में खुश हैं।हलाँकि यह सब एक छोटे से प्रयास का ही परिणाम है।यदि खगड़िया जिला का खादी भंडार को फिर से एक बार पुनर्जीवित किया जाये तो इलाके में यह अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो सकता है।