साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता मैथिली व हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार प्रो. मायानंद मिश्र के तीसरी पुण्यतिथि पर श्रधांजलि अर्पित !

2073

सहरसा : साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता मैथिली व हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार प्रो. मायानंद मिश्र के तीसरी पुण्यतिथि पर शहर के बुद्विजीवी, पत्रकार, साहित्यकारों ने अपने-अपने तरीकों से याद कर बुधवार को श्रधांजलि अर्पित किया।युवा साहित्यकार शैलेंद्र मिश्र शैली ने अपने अंदाज में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि साहित्य क्षेत्र की महान आत्मा कहे जाने वाले प्रो.मायानन्द मिश्र तीन वर्ष पूर्व आज ही के दिन इस संसार से अलविदा कह गए। हमारे पास बस उनकी स्मृति और रचित विपुल साहित्य ही हमारा संबल है। उन्हीने मैथिली के शांतिदूत कह कर नमन किया।koshixpress

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित 

मालूम हो कि मैथिली उपन्यास ‘मंत्रपुत्र’ के लिए उन्हें वर्ष 1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किये गए थे और हिंदी उपन्यास ‘सोने की नैया, माटी के लोग’ से आंचलिक कथाकार के रूप में उनकी देश स्तरीय पहचान बनी. मायानंद मैथिली कथा साहित्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले त्रिमूर्ति में से एक थे. त्रिमूर्ति यानी ललित, राजकमल, मायानंद. सुरीली आवाज के धनी मायानंद युवावस्था में कीर्तन मंडलियों में भजन गायक के रूप में जाने जाते थे. बाद में वह रंगकर्म से भी जुड़े. |प्रो. हरिमोहन झा के हास्य-व्यंग्य मूलक कथाओं से प्रभावित मायानंद ने शुरुआत में हास्य-व्यंग्य रचनाएं कीं. उनका पहला कथा संग्रह ‘भांगक लोटा’ वर्ष 1951 में प्रकाशित हुआ था. आधुनिक मैथिली साहित्य को विश्वस्तरीय कथाएं देने वाले कथाकार ललित और राजकमल चौधरी के संपर्क में आने के बाद मायानंद ने स्वयं को गंभीर कथा लेखन की ओर मोड़ लिया |‘भांगक लोटा’ के अलावा उनके प्रकाशित मैथिली कथा संग्रह हैं- आगि मोम आ पाथर, खोंता आ चिड़ै और चंद्रबिंदु. मायानंद मैथिली के कवि एवं गीतकार भी थे. उनके काव्य संग्रह ‘दिशांतर’ और ‘अवांतर’ प्रकाशित हैं. उन्होंने गजलें भी लिखीं, जिन्हें उन्होंने गीतल नाम दिया.

संक्षिप्त परिचय :

मायानंद मिश्र का जन्म बिहार के सहरसा (अब सुपौल) जिले के बनैनियां गांव में 17 अगस्त, 1934 को हुआ था और 31 अगस्त 2013 को दुनिया छोड़ गए। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मायानंद ने सन् 1950 के दशक में लेखन की शुरुआत की थी. प्रारंभिक दिनों में वह आकाशवाणी पटना से जुड़े रहे. बाद में सहरसा के विद्यापति नगर में रहते हुए वर्षो तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया |

रचना 

मैथिली में मायानंद के उपन्यास हैं ‘मंत्रपुत्र’, ‘प्रथमं शैल पुत्री च’, ‘स्त्रीधन’, ‘सूर्यास्त’ और ‘ठकनी’. हिंदी में ‘सोने की नैया, माटी के लोग’ के अलावा उन्होंने वैदिक काल को जीवंत करता उपन्यास ‘पुरोहित’ लिखा. राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित उनका यह ऐतिहासिक उपन्यास काफी चर्चित रहा है.

मायानंद को वर्ष 1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2002 में प्रबोध साहित्य सम्मान मिला.

विद्यापति स्मृति पर्व मनाने की परंपरा की शुरुआत करने वाले संस्कृति-कर्मियों में शुमार मायानंद मिश्र ने उत्कृष्ट उद्घोषक के रूप में भी अपनी पहचान बनाई थी. उन्हें जानने वाले लोग निदा फाजली की तरह पान से रंगे होंठों पर उनकी मीठी मुस्कान को शायद ही भूल पाएं.