विकास की दौर में हासिये पर टमटम,नहीं सुनाई देती घोड़े की टाप !

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मुकेश कुमार मिश्र :  बिहार के सड़को पर पर यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ताँगा जिन्हें स्थानीय बोली में टमटम कहते हैं,आज तेज रफ्तार युग में कहीं पीछे छूटता जा रहा है ।कुछ वर्षों पूर्व तक के विभिन्न जिलो की सडको पर चलने वाली टमटम अब नही दीखते |koshixpress

अवसान पर है टमटम युग के

खगड़िया के विभिन्न पंचायतों के अलावे परबत्ता से अगुवानी घाट के बीच कई दर्जन टमटम चला करते थे ।इसके साथ ही परबत्ता – नयागांव,परबत्ता – मड़ैया, परबत्ता – सलारपुर तथा परबत्ता – जमालपुर के बीच भी यह टमटम सेवा चला करती थी ।खुली हवा में टमटम चालक तथा सवारी अपने घर – गृहस्थी,गांव – इलाके के बारे में बात – चीत करते हुए सफर को आनंदमय बनाते हुए तय करते थे ।कम दूरी का सफर करने वाले सवारियों को तेज सवारी गाड़ी पर नहीं जाने का आग्रह करते तथा टमटम पड़ाव पर बस आदि के रुकने पर बस चालक से नोक–झोंक करते देखकर लोगों का ध्यान बरबस ही टमटम पेशेदारों की ओर आकर्षित हो जाता था ।वर्ष 1990 के दशक में बाजारवाद तथा उपभोक्तावाद को बढावा देने की सरकारी नीति लागू होने के बाद सड़कों पर से टमटम धीरे-धीरे गायब होने लगे तथा उसके स्थान पर अॉटो,जीप तथा जुगाड़ गाड़ी आ गयीं ।जाहिर तौर पर इन गाड़ियों के आ जाने से इन टमटम चालकों पर आजीविका का संकट पैदा होने लगा ।koshixpress

टमटम चालक रोजी-रोजगार के लिए कर रहे हैं पलायन

पहले इन टमटम चालकों की एकता भी उनके व्यवसाय को जिंदा रखने में उनकी मदद करती थी ।किन्तु आज अधिकांश टमटम चालक अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये अपने स्तर से संघर्ष करने को विवश हैं ।जिन टमटम चालकों के पास एक घोड़ा और ताँगा रहने के कारण स्वरोजगार था तथा वह पैसा घूम फिर कर किसानों के पास ही जाता था ।वह रुपया अब पेट्रोल और डीजल के साथ साथ मशीन के कल पुर्जों में लगने लगे हैं ।जो अंतत: बड़े पूँजीपतियों के माध्यम से गांव से देश के बड़े शहरों में तथा यहाँ तक कि विदेश जाने लगा ।टमटम चालक महज 20-25 हजार की लागत से अपने पूरे परिवार का भरण–पोषण किया करता थे ।

हिंदी सहित भोजपुरी फिल्मों में भी रहा है टमटम (टांगे) का क्रेज 

अब इस काम की दुर्दशा देखकर उनमें से अधिकांश ने दूसरे धंधों में हाथ आजमाया लेकिन वे विफल रहे ।हताश और निराश होकर इनमें से अधिकांश अब मजदूरी करने लगे या दिल्ली – पंजाब का रुख किया ।इस भाग-दौड़ की दुनिया में अब किसी के पास इतना वक्त नहीं है की पाँच किलोमीटर की यात्रा में अपना आधा घंटा समय दे सके ।बहरहाल इस तेज रफ्तार दुनिया में अपने अस्तित्व बचाने की आखिरी दौड़ में टमटम हारता जा रहा है ।साथ ही हारती जा रही है वह संस्कृति जिसमें यात्रा में यात्रियों के साथ भाईचारा भी मंजिल तय करता था |