टूटने लगा है निर्मल ग्राम का सपना !

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मधेपुरा (संजय कुमार सुमन) : ‘बेटी ब्याहूंगी वहीं जहां होगा शौचालय’ नारे के साथ चौसा में शुभारंभ की गई स्वच्छता अभियान के तहत बने शौचालय निर्माण योजना पूरी तरह सिफर साबित हो रहा है। लोहिया स्वच्छता योजना से प्रारंभ क्षेत्र में बड़े ही ताम-झाम के साथ संपूर्ण स्वच्छता अभियान,निर्मल भारत अभियान के बाद स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण को गति प्रदान करने को लेकर जनप्रतिनिधियों के साथ वरीय पदाधिकारियों की बैठक एवं जोर-शोर से प्रचार किये जाने के बावजूद भी नतीजा बेहतर साबित नहीं हो सका। क्षेत्र में अब भी खुले में शौच बदस्तूर जारी है।

गावों में बनाया गया शौचालय
गावों में बनाया गया शौचालय

क्या है योजना
‘बेटी ब्याहूंगी वहीं जहां होगा शौचालय’ आदि नारों के साथ मधेपुरा जिले में वर्ष 2007 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान,2009-10 में लोहिया स्वच्छता अभियान और 2013-14 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरूआत हुई। संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत एपीएल परिवार को सरकार की ओर से तीन हजार एवं लाभार्थी को पांच सौ रूपये का वहन करना था। वहीं बीपीएल परिवार के लिए सरकार की तरफ से 32 सौ एवं लाभार्थी को तीन सौ का वहन करना था एवं लोहिया स्वच्छता अभियान के तहत निर्माण पर 25 सौ रूपये की लागत तय की गयी। जिसमें 22 सौ रूपये सरकार एवं तीन सौ रूपये लाभार्थी द्वारा वहन किया जाना था। योजना में अनुसूचित जाति एवं जन जाति के लिए निःशुल्क निर्माण करवाया जाना था। इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रत्येक मुखिया को कम से कम दो सौ शौचालय निर्माण करने का लक्ष्य दिया गया। नियमानुसार सरकार की ओर से पीएचईडी के माध्यम से 46 सौ एवं मनरेगा को 45 सौ तथा लाभार्थी को नौ सौ कुल दस हजार रूपये निर्माण लागत तय किया गया।

शौचालय निर्माण की जिम्मेदारी किनकी है
लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा गांव-गांव शौचालय निर्माण कराने के लिए स्वंयसेवी संगठनों को अधिकृत किया गया। शुरूआती दौर में शौचालय निर्माण में स्वंयसेवी संस्थानों ने दिलचस्पी दिखाई परन्तु बाद में लाभप्रद सौदा नहीं पाये जाने के कारण उनकी दिलचस्पी काफी कम हो गई।चौसा  प्रखंड के किसी भी पंचायत में 15 से 20 प्रतिशत से अधिक कार्य नहीं हो पाया हैं।

भगवान भरोसे किया गया निर्माण
विभाग द्वारा हर परिवार को शौचालय मुहैया करा देने का दावा यहां खोखला साबित हो गया है। इस अभियान में बरती गई शिथिलता सरकारी दावे पर प्रश्न चिन्ह खड़ी कर गई। ग्राम पंचायत द्वारा निर्माण कराये जाने की बात विभाग करता है परन्तु अभी तक किसी भी पंचायत के प्रतिनिधि अपनी रूचि नहीं दिखाई है।

गावों में बनाया गया शौचालय
गावों में बनाया गया शौचालय

क्या हालत है शौचालय की
प्रखंड के कमोबेश गांवों में बने शौचालय आधे अधूरे हैं। जिसके कारण परिवार के सदस्यों द्वारा इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। हालांकि शौचालय निर्माण के प्रति लोगों में जागरूकता जगी है और हर परिवार के लोग इसका लाभ उठाने के लिए इच्छुक हैं। खुले मैदान में शौच के लिए बाहर जाना ना सिर्फ एक सामाजिक बुराई है बल्कि महिलाओं के लिए नुकसानदेह है। जोर जबर्दस्ती के अधिकांश मामले इन्हीं कारणों से होती है। सरकार ने इस सामाजिक बुराई को दूर करने की मंशा से यह योजना चलायी परन्तु विभागीय उदासीनता के कारण यह दूरगाामी योजना दम तोड़ती नजर आ रही है।

क्या कहते हैं ग्रामीण
मोरसंडा निवासी कंचन देवी,यशोदा देवी,उमा देवी,अजगैवा की रूबी देवी,सुलेखा देवी,नीलू देवी कहती हैं कि विभाग द्वारा शौचालय तो बनाया गया लेकिन निर्माण कार्य में बड़े पैमाने पर लूट खसोट किया गया। गुणवत्ता पूर्ण शौचालय नहीं बनने के कारण प्रयोग विहीन हो गया।

बहरहाल जो भी हो सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना विभागीय उदासीनता एवं घोर लापरवाही के कारण दम तोड़ता नजर आ रहा है। यदि इस कार्य की उच्चस्तरीय जांच कराई जाय तो कई नामचीन चेहरे सामने आयेंगे।