बाढ़ से पशुचारे का घोर संकट उत्पन्न !

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घास लाते किसान

मधेपुरा (संजय कुमार सुमन) : मधेपुरा,पूर्णिया,भागलपुर एवं खगड़िया जिले के सीमा पर अवस्थित चौसा में इन दिनों पशुचारे का घोर संकट उत्पन्न हो गया है। चौसा एवं इसके सीमावर्ती क्षेत्रों की लगभग 80 फीसदी आबादी कृषि कार्य से जुड़े है। कृषि के साथ साथ पशुपालन यहाँ के किसानों का मुख्य पेशा है। पशुओं को भी सही तरीके से भोजन नही मिल पाने के कारण उनमें दूध देने की क्षमता कम सी हो गई है। इससे पशुपालक हताश एवं परेशान हो रहे है।

बताया जाता है कि पशुओं के चारे के रूप में सर्वाधिक उपयोग गेहूं के भूसा का होता है। लेकिन पूरा इलाका भूसे की किल्लत से जूझ रहा है। लगातार पिछले तीन वर्षाें से गेहूं की कम पैदावार की वजह से पशुपालक भूसे की कमी से परेशान थे। रही सही कसर प्रत्येक साल आने वाली बाढ़ ने पूरी कर दी। वर्ष 2008 में कुसहा तटबंध के टूटने से आयी भयंकर बाढ़,वर्ष 2009 में मौसम की बेरूखी,2011 से लगातार 2014 तक ओलावृष्टि एवं इस वर्ष रूक-रूक हो रही भारी वर्षा और तेज हवा ने किसानों की कमर ही तोड़ दी है। स्थिति यह है कि किसानों की स्थिति बदतर होती जा रही है। यहाँ के किसानों को कभी बाढ़ ने डूबोया तो कभी सूखे ने सताया और जो कुछ बचा उसे जमाखोरों एवं मंहगाई ने लूटा। मालूम हो चौसा की आधी आबादी साल के छह माह बाढ़ से प्रभावित रहती है।koshixpress

प्राकृतिक आपदाओं की वजह से सीधे तौड़ पर फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। लेकिन ये प्राकृतिक आपदाएं पशुओं एवं पशुपालक किसानों के लिए ‘महाआपदा’ साबित हो रही है। फसल के बर्बाद होने से ‘साइड इफेक्ट’ के रूप में पशुओं के लिए चारे का संकट उत्पन्न हो गया है। ओलावृष्टि की वजह से वैसे फसलें सर्वाधिक प्रभावित हुई जिससे पशुचारा की प्राप्ति होती है। फिलवक्त भूसा 2000 से 2500 रूपये प्रति क्ंिवटल बिक रहा है जो किसानों के लिए परेशानी का सबब बना है। मक्का भी व्यापक पैमाने पर पशुचारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मक्का की फसल जब तैयार हो जाती है तो उसके डंठल को पशुचारा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अब उसकी भी उम्मीद क्षीण है। प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक गेंहू एवं मकई की फसल प्रभवित हुई। जाहिर है कि आपदाओं ने भूसा के सबसे बड़े óोत को ही जमीनदोज कर डाला। इसके अलावा पशुचारा के रूप में जो घंास उपजाये जाते हैं,वह भी इस आपदाओं में प्रभावित हुईं है। दलहन के प्रभावित होने से भी पशुचारा पर संकट आ खड़ा हुआ है। पशुओं को खासकर गाय एवं भैस को कुछ रेडीमेड आहार भी पशुपालकों द्वारा खिलाए जाते हैं लेकिन इसके कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि आम किसानों के बूते की बात नही है।

प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी डा0 गगन कुमार झा कहते हैं कि पशुचारा की किल्लत से इंकार नहीं किया जा सकता है। चैसा को पिछले दो वर्षो से विभाग द्वारा चारा उपलब्ध नही कराया गया है। बार बार विभाग से आग्रह किया जाता है लेकिन अब तक आपूर्ति नही की गई है।

बहरहाल जो भी हो पशुचारे की समस्या ने किसानों के समक्ष संकट पैदा कर दिया है। पशुओं को भर पेट चारा बड़ी मुश्किल से मिल पाता है। किसान घंास की खोज में दर दर भटक रहे है। चारे के अभाव में गाय एवं भैंस सही तरीके से दूध नही दे पाती है। इससे किसानों की आथर््िाक स्थिति कमजोर होती दिखती है। पशुपालक शंकर यादव,मुकेश यादव,विकाश मंडल आदि बताते हैं कि मेरा पूरा परिवार इसी पर निर्भर है लेकिन गाय भैंस अब उतनी दुध नही देती है कि पूरे परिवार का भरण पोषण हो सके। क्या करू कुछ भी समझ में नही आता है।