जेवर निर्माण का केन्द्र सलारपुर,चाँदी के जेवरों का होता है निर्माण !

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खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिला के परबत्ता प्रखंड के कुल्हड़िया पंचायत अन्तर्गत सलारपुर गांव को गंगा के बार – बार कटाव भी उसके समृद्ध विरासत को जुदा नहीं कर सकी।आज भी गांव के स्वर्णकार टोला में विगत सौ वर्षों से जेवर निर्माण के क्षेत्र में पीढी दर पीढी कार्य कर स्वरोजगार के क्षेत्र में एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।इस टोला के बीस स्वर्णकार परिवार आज भी चाँदी के जेवर का निर्माण करते हैं। इसमें अमृती बाला , हाथ में पहनने वाला छंद , गले की हँसुली , पायल तथा चाँदी के मोटे जेवर शामिल हैं। आज भी इन जेवरों के निर्माण में पुराने तौर – तरीके एवं औजारों का प्रयोग किया जाता है।यहाँ प्रत्येक सामान हाथ से बनाया जाता है। कई दशकों के गुजरने के बाद भी कारीगरी में केवल इतना ही अंतर हुआ है कि अब ताप पैदा करने के लिये किरोसिन की बजाय गैस का उपयोग होने लगा है। परबत्ता प्रखंड का इस सबसे पुराने जेवर निर्माण केन्द्र की बनायी हुई “दुल्हन पायल” की माँग आज भी बाजार में बनी हुई है।
यहाँ के कारीगर बतातें हैं कि जापानी मशीनों के आने के बाद से जेवर निर्माण के क्षेत्र में हल्के आभूषणों का प्रचलन बढा है।मंहगाई भी कम वजन के हल्के जेवरों की बिक्री बढाने में सहायक हुआ।फिर भी यहाँ के बनाये हुए जेवरों की इतनी मांग जरुर है कि यहाँ के कारीगरों की दाल – रोटी चल जाती है।कारीगर बताते हैं कि जेवर निर्माण के कार्य में घर के सभी सदस्य , यहाँ तक कि महिलाएँ व बच्चे भी कुछ न कुछ योगदान करते हैं।इस प्रकार घर में रहकर सम्मान के साथ जीवन चल जाता है।मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बावजूद ये सभी कार्य में मग्न एवं खुश रहते हैं।
उच्च डिग्रीधारी युवा भी इस कार्य में प्रवृत होने में संकोच नहीं करते हैं।इसे आज के समय में अपवाद भी कहा जा सकता है।यदि इनमें से किसी के घर के युवा को नौकरी लग जाती है तो अच्छा , अन्यथा घर का काम तो हाथ में ही रहता है।जेवर निर्माण का यह हुनर एक पीढी से दूसरी पीढी में स्वत: हस्तांतरित होती जाती है। आत्मनिर्भरता से लबरेज इस गली आज बैलगाड़ी या ट्रेक्टर को गुजरने में भले ही परेशानी हो , किन्तु इन 20-25 स्वर्णकार परिवारों का जीवन सुगम व सम्मानजनक है तथा इसे बनाने में इस परंपरागत हुनर का बड़ा योगदान है।विगत एक दशक में परबत्ता बाजार में तीन दर्जन से अधिक ज्वेलर्स की दुकाने खुली , किन्तु इसमें अधिकांश केवल खरीद बिक्री करने वाले व्यवसायी हैं,धातु को रुप आकार देकर जेवर बनाने वाले शिल्पकार नहीं हैं।
इन शिल्पकारों एवं कुटीर उद्योग के स्तर पर जेवर निर्माण करने वाले कारीगरों के कल्याण के लिये भले ही कोई सरकारी या गैरसरकारी महकमा सामने नहीं आये,ये किसी रियायत या सहायता की उम्मीद भी नहीं रखते हैं।सभी लोग सिर्फ शांति एवं विधि – व्यवस्था चाहते हैं।इसके लिये सलारपुर चौक पर पुलिस चौकी स्थापना की मांग जारी है।