सड़को के आईनें में सामाजिक न्याय की तस्वीरे देखनी हो तो एक बार जरुर सफर करे !

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चौसा -फुलौत सड़क मार्ग

मधेपुरा (संजय कुमार सुमन)  : सड़क के नाम पर राजनीति करने वालों ने चुनाव दर चुनाव मुद्दों को लेकर बार-बार अपनी फतह हासिल की। चौसा की सड़को के आईनें में सामाजिक न्याय की तस्वीरे देखा जा सकता है। जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक हुक्मरानों ने अपने-अपने हिसाब से क्षेत्र ही नही बल्कि राष्ट्रीय एवं राज्यमार्गों को चमकाने के उद्देश्य से करोड़ों रूपये खर्च किए परन्तु वर्षो बीत जाने के बावजूद क्षेत्र की लाखों जनता सड़क की सुविधा से आज भी मरहूम है।

           “छेड़ न तू मुझको यहीं तक रहने दे दास्तान मेरी,
          सच कहूंगा तो जल जाएगा दिल तुम्हारा और जुबां मेरी”
अगर जिले के चौसा की सड़कों से उसकी प्रतिक्रिया मांगी जाए तो निःसंदेह वह अपने मूक जबां से उक्त कथन को ही दुहरायेगी।

आखिर कब तक सड़क की बदहाली पर रोते रहेंगे आम-आवाम 

कागजी आकड़े में कैद विकास के पन्नों पर चाहे जो भी लिखा जाता हो मगर जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां काता है।चौसा से फुलौत,चौसा से अरजपुर पूर्णियाँ सीमा,चौसा से उदाकिशुनगंज,भटगामा से मनोहरपुर की सड़कों पर चलना किसी लोहे के चने चबाने के बराबर है। समय दर समय गड्ढों में बन आयी सड़क और सड़कों में बने गड्ढे के बीच तुलना करने वालों ने विभागीय पचड़े,कागजी घोड़े,बिचैलियों,रंगदारों एवं संवेदकों के लिए अवश्यभावी बाढ़ को ही इन जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासनिक हुक्मरानों का संकट मोचन मान लिया है। चौसा में सड़के तो बनती है पर बनते ही कुछ ही दिनों के बाद टूटने भी लगती है।

सड़क निर्माण प्रक्रिया में गुणवत्ता का ख्याल नही

जानकारों की मानें तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सड़क निर्माण प्रक्रिया में गुणवत्ता का ख्याल नही रखा जाता है और ना ही सड़क बनने के बाद भी इस बात की जांच की जाती है कि सही मापदंडों के अनुसार निर्माण कार्य हुआ या नही। सड़क निर्माण में घ्टिया स्तर के साम्रगियों का उपयोग भी किया जाता है। सड़क नर्मिाण में अधिकांशतः मरा हुआ मेटल प्रयोग किया जाता है जो रोलर चलने के साथ ही टूटने लगता है। तकनीकी विशेषज्ञ सड़क निर्माण के समय निर्माण स्थल पर नही रहते है। फलस्वरूप कायदे कानून कागज तक ही सीमित रहते है। ऐसा खस्ताहाल सड़को के कारण आये दिन सड़क दुर्घटनायें होती रहती है। जिनमें जाने कितने बेकसूर लोंगांे को अपनी जान से हाथ थोना पड़ता है।कितने बार इन सड़को पर लंबी-लंबी वाहनों की कतारें निकलने में काफी समय गुजार देते है।एक तो प्राक्कलन के अनुसार सड़कों का निर्माण कार्य नही हुआ वहीं यहाँ की सड़कों पर कार्य को लेकर ऊँट के मुंह में जीरा का फोरन वाली कहावट सटीक बैठती है। यही कारण है कि कतिपय क्षेत्रों में सड़क का वजूद तक मिट चुका है। वैसे भी जब सड़क निर्माण के नाम पर आई राशि पर अधिकारियों एवं अभिकत्र्ताओं की निगाहें एक साथ टिकी है तो फिर सड़क नरक में तब्दील नही रहे तो आखिर क्यों।
बहरहाल जो भी हो,इन सड़कांे पर चलने से लगता है कि झूला पर झूल रहे हों। योजना के बंटवारे तथा अनुशंसाओं को जारी करने में जितनी तेजी एवं तत्परता दिखायी जाती रहीं है अगर वही तत्परता कार्य पूर्ण कराने के प्रति जवाबदेह लोगों की होती तो विकास के आईने में सड़क बदनुमा धब्बा जैसा नजर नही आती।