खेतीवारी छोड़ पलायन को मजबूर किसान !

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फोटो-सांकेतिक

मधेपुरा (संजय कुमार सुमन) : लघु एवं सीमांत किसानों को कड़ी मेहनत एवं लगन से तैयार फसलों का मुल्य निर्धारित नहीं होने एवं कौड़ी के मोल अनाज की बिक्री से उनकी हालात दयनीय है। जिससे उनके जीविकोपार्जन का एक मात्र आधार कृषि कार्य अब घाटे का सौदा साबित होने लगा है। ऐसी स्थिति में अब किसान भी क्षेत्र से अन्यत्र पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अपने हाल पर रोते हुए चौसा प्रखंड के किसानों की कोई खबर लेने वाला नहीं है।

मूल्य निर्धारण नही होने से समस्या 
बेमौसम वर्षा एवं कड़ी धूप में भी रात-दिन एक कर फसलों को सपरिवार मिलकर तैयार करने में किसान लगे हुए हैं लेकिन उपजाएं गये अनाजों का मूल्य निर्धारित नहीं होने से कौड़ी के भाव बिकने के कारण उनकी हालत बदतर होती जा रही है। क्षेत्र में ऐसे लघु एवं सीमांत खेतिहर मजदूर एवं किसानों के लिए अपने परिवार के जीविकोपार्जन का मुख्यपेशा कृषि ही है। इसी से बच्चों की दवा,शिक्षा,वस्त्र एवं शादी विवाह आदि जरूरतों की पूर्ति की चिंता काफी बढ़ गई है। फलस्वरूप किसान अपने परिवार के भविष्य के प्रति काफी चिंतित हैं।

बाढ़ सुखाड़ का दंश झेलना मज़बूरी 
प्रखंड के चिरौरी,खोपड़िया,शंकरपुर,मोरसंडा,अजगैवा,फुलौत आदि गांवों के भ्रमण के दौरान बहुत से छोटे एवं सीमांत किसानों की व्यथा सुनने एवं देखने से लगता है कि इन किसानों के अंदर जो पीड़ा एवं बैचेनी है इससे वे अपने भविष्य को लेकर काफी सशंकित है। टूटे-फुटे घर,फटे हुए वस्त्र,दुर्बल एवं कल्पित कई खेतिहर मजदूर एवं किसानों ने बताया कि हमलोगों की माली हालत दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। वे सामातिक भेद-भाव के भी शिकार हो रहे हैं क्योंकि बुद्धिजीवि वर्ग खेतिहर मजदूरों एवं किसानों को ‘ढेलफोरवा’ कह कर और कमजोर जानकर सामाजिक शोषण एवं उपेक्षा के शिकार कर रहे हैं। इसके बावजूद क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किसानों की मूल समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इनके फसल को भी कभी सूखे ने सताया तो कभी बाढ़ ने डुबोया और जो कुछ बचा उसे जमाखोरों ने लूटा।

क्या कहते है किसान 
कृषक विष्णुदेव साह,निरंजन यादव,सच्चिदानंद चोधरी,मुकेश मंडल आदि किसान अपनी इस हालात के लिए मुख्य रूप से क्षेत्र के जनप्रतिनिधि एवं प्रशासनिक अधिकारियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। बकौल कृषक जब चुनाव का समय आता है तो बहुत लंबी चैड़ी बात से वोट लेकर चले जाते हैं फिर दर्शन भी दुर्लभ हो जाता है। खेती की उपज से उनकी जरूरतों की पूर्ति नहीं हो पा रही है। गेहूं,मकई,दलहन एवं तेलहन की खेती कभी-कभी लागत पूंजी भी वापस नहीं हो पाता है। साथ ही वे लोग चार से छह महीने तक शारीरिक परिश्रम करते रहते है। इस बार गेंहू में दाना नही आया। मकई पर भरोसा किया तो तेज आंधी एवं बारिश ने इसे भी तबाह कर दिया।
बहरहाल जो भी हो,ये खेतिहर मजदूर किसान अपने भाग्य को कोस रहे हैं।