सामाजिक एवं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दर्जनों तालाब एवं जलकर बेकार !

1874
सालो भर पानी रहने वाला तालाब सूखा पड़ा

मधेपुरा (संजय कुमार सुमन) : प्राचीन समय में तालाब ही गांव की प्यास बुझाते थे। उन्हीं से सिचाई का पानी भी मिलता था लेकिन आज गिने चुने ही तालाब देखने को मिलता है। तालाबों के प्रति बढ़ती सामाजिक एवं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण चौसा प्रखंड के दर्जनों तालाब एवं जलकर बेकार हो गये हैं। तालाबों में पानी की जगह जंगली दूब एवं घास उपज रही है। समाज एवं तंत्र द्वारा पैदा की हुई इस विरोधाभासी स्थिति का फल वर्तमान पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। तालाबों के सौन्दर्यीकरण एवं उसके साफ-सफाई पर मनरेगा द्वारा किया गया करोड़ो रूपये का खर्च बेकार ही साबित हो रहा है। नतीजतन चौसा प्रखंड के सभी तालाब सूखे पड़े है।

तालाब खुद पानी का मोहताज बना

चौसा प्रखंड के फुलौत,चिरौरी,कलासन,घोषई,लौआलगान,पैना,मोरसंडा आदि पंचायतों में एक दर्जन से अधिक सार्वजनिक तालाब है। जहां जाति और धर्म के लोग एक साथ मिलकर छठ पर्व मनाते थे। इसके अलावे कई सामाजिक कार्य भी इसी तालाब पर हुआ करते थे। यहां तक कि इन तालाबों में आसपास गांव के लोग अपने पशुओं को गर्मी के दिन में नहलाते तथा पानी भी पिलाते थे। पशुओं के अलावे बच्चे भी इसमें नहाने के बहाने मौज मस्ती भी किया करते थे। कई बार इस तालाब में स्थानीय लोगों द्वारा नौका विहार और तैराकी प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। इसके अलावे एक समय था जब इन तालाबों से आसपास के जमीन की सिंचाई भी किसान कर लिया करते थे। मगर अब तो यह पोखर बेईमान पिया की तरह धोखे दे रही है। तालाब आज खुद पानी का मोहताज बना हुआ है।

चांप और चौर में भी पानी का अभाव
चौसा प्रखंड के मोरसंडा,चिरौरी,फुलौत,लौआलगान पंचायत के कई गांव कोसी नदी के मुहाने पर अवस्थित है। लगातार कोसी नदी के बहने से दर्जनों की संख्या में अस्थाई चांप और चौर भी है। जहां सालों भर पानी रहता था। बाढ़ के समय में मुख्य कोसी नदी से पानी उफनाकर गांव-गांव एवं आस-पास के खेत खलिहान एवं तालाब-पोखर में पानी फैल जाती थी। लेकिन इन दिनों कोसी नदी के जलस्तर में काफी कमी आ गई और कोसी नदी की धरा सिमट कर सिकुड़ गई है। अब चांप और चौर में भी पानी का अभाव दिख रहा है।चांप औरचौर में सालो भर पानी के जमे रहने और कोसी नदी के पानी आने से यहां घोंघा,कोकराहा,सौरखी,कोका के फूल आदि की अच्छी मात्रा थी। इसके अलावे सरौंची का साग,सिंगही एवं कबैय मछलियां प्रमुख रूप से पायी जाती थी। जो गरीब लोग इन्हें खाद्य सामग्री के रूप में इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब चांप और चौर के सूखे होने से इन पर संकट तो गहरा ही गया है और गरीबों को मुफ्त में मिलने वाली प्रोटीन युक्त भोजन पर भी ग्रहण लग गया है।

जमकर हुई लूट 
मालूम हो कि चौसा प्रखंड में मछली पालन के उद्देश्य से मनरेगा द्वारा दर्जनों स्थानों पर तालाब की खुदाई की गई। तालाबों के विकास के नाम पर जमकर लूट हुई। जिसके कारण तालाब आज बदहाल है और ठीकेदार मालामाल हो गये। दर्जनों बार तालाब की खुदाई और सफाई के नाम पर करोड़ों रूपये की निकासी की गई लेकिन धरातल पर तालाब अपने स्वरूप में कभी लौट नहीं पाया। ऐतिहासिक महत्व रखने वाले कई तालाब आज बदहाली में अपना अस्तित्व खोने को मजबूर है। चंद लोगों ने तालाब की पहचान को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के बजाय अपने चंद स्वार्थ के लिए लूट मचाई। स्थानीय लोगों ने विरोध भी किया पर हुक्मरानों के सामने किसकी चलती है जगजाहिर है।

क्या कहते है ….
चौसा प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति लिमिटेड के अंचल मंत्री शंभू प्रसाद सिंह कहते हैं कि प्रखंड के सभी तालाब मृत प्राय हैं। जो दुखद है। चौसा के दस तालाबों को मनरेगा योजना अन्तर्गत जीर्णाद्धार करने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए जिला पदाधिकारी मधेपुरा ने सूची जारी कर अंचल पदाधिकारी को मापी करने का आदेश दिया है जो मापी का कार्य किया जा रहा है।