कुत्ता : डॉ० भूपेन्द्र मधेपुरी की कविता !

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डॉ० भूपेन्द्र मधेपुरी

पढ़ा लिखा कोई किशोर 

माँ-बाप नहीं घर-बार छोड़ 

वह पहुँच गया अनजान शहर 

और देने लगा दस्तक दर-दर 

लेकिन,

मन में यह भाव लिए 

कुछ काम करूं,कुछ और पढूं –

घुमने लगा वह इधर-उधर 

देने लगा दस्तक दर-दर 

पर मिला न कोई काम उसे 

फुटपाथों पर सो जाता था 

पर पेट नहीं भर पाता था

एक दिन होटल के पास गया 

जूठी थाली को चाट गया-

मालिक बोला रे सुनो इधर 

बरतन धो टेबुल साफ़ करो 

वह लगा जतन से सब करने

इस बीच आ गया -एक ग्राहक 

अन्तर्मन को गुननेवाला 

रे दीनों को सुननेवाला 

हँसकर उसने पूछा किशोर से बाबू !

क्या है नाम तुम्हारा ?

बोलो तो –

सुनकर वह मौन तपस्वी सा 

अन्तर्मन में कुछ सोचा रहा 

क्या दूँ जवाब सिर नोच रहा 

इसमें क्षण-दो-क्षण बीता 

फिर आँखे मूंद कहा –

कुत्ता !

(कवि – डॉ० भूपेन्द्र मधेपुरी  )