दहेज : डॉ० भूपेंद्र मधेपुरी की रचना !

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तस्वीर सांकेतिक मात्र

लो मिली मुल्क को आज़ादी

सचमुच हम आज़ाद हो गये

पूर्वज की गौरव-समाधि पर

लेकिन हम सौ बार रों गये

पुरखों ने जनहित जिया मगर

हम जीते धन अर्जन खातिर

वे गुजरे नियमों से बंध कर

छोड़ा हमने सब कुछ आखिर

कॉलेजों में मत क्लास करो

बिन पढ़े परीक्षा पास करो

नौकरी अगर मिल गई कहीं

टेबुल के नीचे बात करो

दो टके किलो से भी सस्ते

दुल्हे घर-घर बिकने जाते

है शर्म यहाँ खुद शर्मिंदा

पर वे न कभी भी शर्माते

पूछो बेटी के बापू से

क्या-क्या मज़बूरी आती है

रे दरवाजे से बिन ब्याहे

बारात लौट क्यों जाती है ?

अब सुनो वधू-वर के बापू

मन में ये बातें रख लेना

है लेन-देन अपराध तिलक

से मजा सजा की चख लेना

वर के पापा तुम ही रहते

लाखों तक यों गुम ही रहते

मारुती टीवी ओं टू-इन-वन

चाहिए दुल्हनियां आल-इन-वन

कोई आइटम यदि नहीं मिला

दुर्गावतार बन गई सास

मिलती नैहर परिजन को बस

निज बेटी की अधजली लाश

असमर्थ पुलिस हाकिम सारे

कानून कोर्ट में रुके हुए

अपनी बेटी के वर खातिर

उनके भी सिर हैं झुके हुए

यह देश कहाँ जा रहा हाय !

आओ सब मिल संकल्प करे

जर्जर समाज का मधेपुरी

सब मिल कर कायाकल्प करे |

श्रोत- (डॉ० भुपेन्द्र मधेपुरी के दृष्टिकोण से )