मक्के का उचित मूल्य नही मिल रहा किसानों को !

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मधेपुरा/चौसा (संजय कुमार सुमन) : मानसून के आने के साथ ही अब मक्का के दामों में लगातार गिरावट आने से चौसा के किसानों एवं ब्यापारियों का हाल बेहाल हो गया है। मक्का के उचित मूल्य नही मिलने से किसान एक बार फिर कर्ज के बोझ तले दबने को विवश है।

देश-विदेश में जाती है यहाँ की मक्का 
ज्ञात हो कि चैसा प्रखंड में मक्का की खेती बड़े पैमाने पर होती है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष मक्के की काफी कम कीमत मिलने से किसान एवं ब्यापारी हताश हो रहे है। बाढ़ एवं बरसात के डर से किसानों ने 1100 से 1150 रूपये की दर से अपना मक्का ब्यापारियों के हाथों बेच दिया लेकिन जो किसान एवं ब्यापारी कीमत बढ़ने के इंतजार में मक्का बेच नही पाऐ उनके अब पसीने छूट रहे हंै। गत वर्ष जहाँ ब्यापारी 1100 से 1300 रूपये प्रति क्विंटल मक्का खरीद कर दालकोला,सिल्लीगोरी,आसाम,बंगलादेश आदि शहरों तक इसका निर्यात किया । अभी  मक्का बेचने पर उतनी ही राशि मिल रही है जितने में भंडारण किया गया। मक्का की काफी कम कीमत मिलने से किसानों एवं ब्यापारियों के हौसले पस्त है। उचित बाजार मूल्य नही मिलने से ब्यापारी एवं किसान आठ आठ आंसू बहाने को विवश हैं। इस परिस्थिति में किसान एवं ब्यापारी अपनी अन्य आवश्यकता की पूर्ति कैसे करे। यह एक सोचनीय विषय है। कई किसान एवं ब्यापारी महाजनों से सूद पर रूपया लेकर मक्का का भंडारण किया लेकिन उचित मूल्य नही मिलने से वे हताश हो रहे है।

हताश-परेशान किसान…..
किसान बाबूलाल चैधरी,पंकज कुमार,विजय यादव बताते हैं कि खेती करने में प्रति एकड़ 12 से 16 हजार रूपये खर्ज आता है। इस बार आसमान छूती किमतों पर बीज,खाद,कीटनाशक की खरीददारी करने के अलावे खेत में लगी फसल को 8 से 10 बार पटवन करनाी पड़ी। जिससे लागत मूल्य डेढ़ गुणा बढ़ गया।
चैसा क्षेत्र में आमतौर पर एक एकड़ में 40 से 50 क्विंटल तक मक्का का उत्पादन होता है परन्तु उत्पादन के हिसाब से किसानों को भंडारण की ब्यवस्था नही है। जिससे वे महंगे दर में इसे बेचने का इंतजार नही कर पाते।

व्यापारी क्या कहते है …..
ब्यापारी सुभाष चैधरी,अशोक सिंह,पंकज मंडल बताते है कि किसानों से प्रति क्विंटल 11 सौ की दर से आज से छह माह पूर्व खरीदा था। खरीद कर भंडारण के लिए भाड़े पर गोदाम लिया। गोदाम का भाड़ा प्रति माह 6000 है। इस हिसाब से पूंजी निकालना भी बड़ी मुश्किल हो रहा है। अगर बाजार का यही हाल रहा तो मक्का खरीद से मुंह मोड़ लेगें।

मक्का आधरित उद्योग स्थापित नही हो सका 
किसानों द्वारा तैयार स्वर्ण मक्के को खरीदने की सरकारी स्तर पर कोई योजना नही है और ना ही उद्योग लगाने की मंशा है। जिसका खामियाजा यहाँ के किसान उठाने को विवश है। बिहार सरकार में मधेपुरा के राजेन्द्र प्रसाद यादव,डा0रविन्द्र चरण यादव,डा0 रेणु देवी कुशवाहा उद्योग मं़त्री के रूप में लगातार कई वर्षों तक रहीं लेकिन मधेपुरा में एक भी उद्योग लगाना मुनासिब नही समझा।
बहरहाल जो भी हो यदि यहाँ मक्का आधरित उद्योग लग जाता है तो किसानों की बदहाली दूर हो जाएगी और यह क्षेत्र आर्थिक सम्पन्न हो जाएगा।