रोटी की तलाश में बचपन कचरे में !

Kunal Kishor
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सुपौल (हरेन्द्र कुमार) : शहर के बच्चे दो वक्त की रोटी तलाश रहे है।यही है नितीश सरकार का विकाश के साथ बढ़ता बिहार।सूर्योदय हुआ नहीं की बच्चे की टोली अपने रोटी की तलाश में शहर के विभिन्न जगहों पर जमा कचरे की ढ़ेर में दो वक्त की रोटी खोजते नजर आते है।दिन हिन् माँ बाप के अबोध  बच्चे पेट की आग को मिटाने के लिये जिस तन्यम्यता के साथ कचरे की ढ़ेर पर बैठकर कुछ बीनते नजर आते है देखकर ऐसा लगता है कि गरीवी अभिशाप है।यह तस्वीर बयां कर रहा है कि सरकार हजार योजनाएं गरीबी दूर करने के लिए भले ही लागु कर दे। मगर उसे गरीबी दूर होने वाला नहीं है।

कचरे में ढूंढता बच्चे अपना भविष्य और रोटी।

मानवता की पाठ पढ़ाने वाले इस देश के अमीर लोग ,बड़े बड़े राजनेता जब किसी गरीब से हाथ भी मिलाते है तो हाथ को इंफेक्शन से बचाने के लिये तुरत महंगे शौप कैमिकल स्प्रे आदि का इस्तेमाल करते है।लेकिन इन अमीर राजनेताओं को इन गरीब बच्चों पर दया नहीं आती कि इन्हें भी बीमारी छु सकता है।प्रशाशन और सरकार का ध्यान इन गरीब बच्चों पर क्यों नहीं जाता है। 6से 14 साल के बच्चों को स्कुल भेजना सरकार के दावे की पोल खोलता है।कचरे पर जीवन बसर करने वाले की संख्या एक दो में नहीं है।काफी संख्या में गरीब के बच्चे कचरे से जुड़े हुए है।स्थानीय प्रशाशन सरकार और तमाम एनजीओ को जो गरीबी उन्मूलन पर काम करते है विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करना चाहिए।