पढ़ाई के नाम पर गले का फंदा और हाफ टिफिन की जिंदगी !

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तस्वीर: सांकेतिक मात्र

विष्णु स्वरूप /सहरसा : अभिभावकों के चिंताहर्णी यंत्र के रूप में बढ़ते कोंचग संस्थानों ने भले थोड़ी राहत दी हो, लेकिन सपनों को पूरा करने में आंषिक रूप से ही सफल हो पाता है. धंधे के नाम पर तेजी से पनपते इस कारोबार का सलाना अनुमानित व्यवसाय अरबों रूपये है. देषभर के कोचिंग संस्थान में कोटा राजस्थान के षिक्षण संस्थानों ने अपनी बुलंदियों के झंडे गाड़ दिये है. विभिन्न संसाधनों द्वारा इसकी ख्याति इतनी फैल चुकी है कि आज हर घर के विद्यार्थी जिन्हें डॉक्टर और इंजीनियर बनना है कोटा की राह पकड़ लेते हैं. लेकिन यहां के कोचिंग संस्थानों और रह रहे छात्रों की एक दूसरी दुनिया भी है. जिसका स्याह सच परदे के पीछे हैं. कोटा में षिक्षण संस्थानों ने इंडस्ट्री का रूप ले लिया है. यहां के लोगों में छात्रों से संबंधित सुविधाओं पर ही आधारित व्यवसाय स्थापित कर लिए हैं. हॉस्टल, पीजी, भोजन, डिब्बा बंद टिफीन, ढ़ाबा इत्यादि मुख्य व्यवसाय है.

कोटा-कोचिंग कैपिटल ऑफ इंडिया
राजस्थान के जयपुर से लगभग 250 किमी दूर कोटा षहर भारत के कोचिंग कैपिटल के रूप में भी जाना जाता है. घनी आबादी वाला यह क्षेत्र जयपुर और जोधपुर के बाद राजस्थान का तीसरा बड़ा षहर है. कभी बूंदी राजघराने का हिस्सा रह चुका कोटा 17 वीं षताब्दी में अलग होकर अपनी अलग राजषाही पहचान स्थापित की. पुराने कई ऐतिहासिक चिन्ह यहां अपनी पुरानी महान गाथाओं को जीवंत करती हुई खड़ी है. बाद के भी कई दर्षनीय स्थल यहां है. जिसमें गढ़ पैलेस, ब्रिज राज भवन पैलेस, जग मंदिर, महादेव मंदिर, गोदावरी धाम टेंपल आदि प्रसिद्ध है. इस क्षेत्र में व्यवसाय के रूप में कोचिंग इन्सटीच्युट का ही बोल बाला है. इन कोचिंग इन्सटीच्युट के अपने माध्यमिक विद्यालय भी इनके साथ है. जिसमें विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षा के लिए पढ़ाई षुरू हो जाती है. कोचिंग क्लासेज के लिए बाहर से आये छात्रों में एलेन कैरियर इन्सटीच्युट, भाइभरेंट एकादमी, आकाष इन्सटीच्युट, बंसल क्लासेज, रिजोन्सेस कैरियर प्वाइंट ज्यादा पोपुलर है. इनके फैकेल्टी मेंबर में डॉक्टर और इंजीनियरों की भरमार है. जिन्हें काफी उच्च कोटी की सैलेरी स्लैब में रखा जाता है. डेढ़ से दो करोड़ रूपये इन फैकेल्टी मेंबरो के उपर खर्च किये जाते है. छात्रों के विभिन्न संस्थानों से इंजीनियरिंग और मेडिकल में सलेक्ट करने का अनुपात भी अधिक है. इसलिए छात्रों एवं फैकेल्टी मेंबर यहां आर्कर्शित होकर आते है.
स्याह सच और प्रेषर
विगत वर्श कोटा में 30 से अधिक आत्म हत्याएं हुई. इस वर्श भी षुरूआती दौर में ही पांच छात्रों ने आत्महत्या कर ली. कोचिंग इन्सटीच्युट और स्थानीय प्रषासन ने इसे गंभीरता से लिया है. कोटा के डीसी ने कहा कि बच्चों के मानसिक स्थिति को एपटीच्युट टेस्ट के जरिये देखा जाना चाहिए. कन्सेलिंग की सतत प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए. कोचिंग के षिक्षकों ने भी इसे गंभीरता से लिया है. वर्श 2010 में इंजीनियरिंग के लिए तैयारी कर रहे छात्रों की संख्या अमूमन 65000 हजार थी. वर्श 11-12 में बढ़कर 70000 हो गयी. इन दौरान मेडिकल के छात्रों की संख्या तकरीबन 17000 से 20 हजार पहुंची. लेकिन वर्श 2014-15 में इंजीनियरिंग के छात्रों का कोचिंग में दाखिला लेने की संख्या 1,25000 हो गयी और मेडिकल छात्रों की बढ़ोत्तरी 40000 तक पहुंचा. वर्श 2010-11 से 2014-15 तक में इन छात्रों के सफलता का आंकड़ा 20 से 33 प्रतिषत तक ही रहा है. अर्थात लगातार बढ़ती संख्या के बावजूद छात्रों से सफलता का आंकड़ा स्थिर होकर 33 प्रतिषत तक ही पहुंच रहा है. सामान्यता यहां रह रहे छात्रों के पढ़ाई का समय 14 से 18 घंटों तक होता है. उपर से क्लास टेस्ट, रूटीन टेस्ट, वीकली टेस्ट से छात्रों के उपर दबाव बना रहता है. अभिभावकों के द्वारा भी छात्रों के उपर दबाव रहता है. 22 वर्श के षिवदत ने आत्महत्या कर ली तो उसके चाचा पुरूशोत्तम ने कहा कि छात्र की गंभीरता और तैयारी देखते हुए उसे गांव के लोग डॉक्टर साहब कहना षुरू कर दिया था. असफलता ने उसे अंदर तक तोड़ दिया आज उसके लिए पूरा परिवार रो रहा है. कोचिंग क्लासेज के प्रेषर से मुकुंद कुमार का पुत्र मात्र 17 वर्शों के उम्र में अस्पतालों के चक्क्र में फंस गया. मुकुंद कुमार कहते है अत्यधिक पढाई और मानसिक दबाव के कारण उसके बेटे को पहले मुर्च्छा आई फिर लगातार मुर्च्छा आना, बिस्तर गीला होना संबंधित परेषानी षुरू हो गयी. अब तो एपेल्पसी अर्थात यादाष्त खोने की बीमारी भी लग गयी है. कोचिंग के नामी डायरेक्टर नवीन माहेष्वरी कहते हैं कि एवरेज छात्रों का सफल होना कठिन है. परंतु उनकी कोषिष और अत्यधिक मेहनत कभी कभार पूरी तरह परख कर ही उसे सलाह देना चाहिए. वस्तुतः अपनी सोच बार बार बच्चों पर थोपना और टोका टाकी से अभिभावक परहेज करें. जवाहर नगर पुलिस स्टेषन के एसएचओ हरीष भारती हाल के कृति आत्महत्या केस के संबंध में कहते हैं कि छात्रा ने जेईई मेन्स में सफलता पाई थी लेकिन मार्क्स कम थे. फलस्वरूप पांचवी मंजिल से छलांग लगा कर उसने जान दे दी. 17 से 22 वर्श के बच्चों का आत्महत्या यह दर्षाता है कि समाज में इंजीनियर या डॉक्टर बनाने को हम कितना तबज्जो देते हैं. विदेषों में खासकर नीदरलैंड की षिक्षा प्रणाली से हमें सीख लेनी चाहिए. सरकार भी इस दिषा में अध्ययन कर रही है. कोटा के छवि पर बढ़ते जा रहे आत्महत्या से बुरा प्रभाव पड़ रहा है. 50 हजार से एक लाख तक के सलाना फीस खर्च करने वाले माता पिता की उम्मीदे भी काफी बढ़ जाती है. लेकिन कभी कभार न भरने वाले जख्म भी उन्हें इन पैसो के बदले मिल रही है.
हाफ टिफीन की जिंदगी
यहां रह रहे छात्रों में आधे बिहारी छात्र है. बिहार में पढ़ाई के गिर रहे स्तर से इनका पलायन बढ़ा है. फिर माता पिता से दूर ऐसो आराम और मस्ती की जिंदगी भी इन्हें आर्कर्शित करती है. यहां रह रहे छात्रों में पचास प्रतिषत छात्र-छात्राएं बिहार की है. 30 प्रतिषत उत्तर प्रदेष और अन्य राज्यों के 20 प्रतिषत छात्र यहां रहते है. इन छात्रों में बिगड़ैल छात्रों की टाइगर वाइकर्स गैंग भी है. जिसके कुछ सदस्यों की बिहारी छात्र से ही झड़प हुई और मारपीट एवं चाकूबाजी की घटना घटी. दो छात्र समेत स्थानीय लोगों के साथ हुई घटना में एक छात्र की मौत भी हो गयी. जिसके बाद कोटा के लोगों में इन कतिपय छात्र समूहों के प्रति जबरदस्त आक्रोष उठा. वस्तुतः रईस मां बाप के बेटे इस तरह की हरकत कर रहे हैं. इसमें भोले भाले छात्र भी हैं जो भरपेट खाना नहीं लेकर हाफ टिफीन ही खाकर रहते है।. आधे पैसे से मोबाइल मोटर साइकिल की पेट्रोल और गर्ल फ्रेंडस को पिज्जा खिलाने में खर्च कर देते है. मोहित कहता है कि पिताजी लगातार पैसे मनमाफिक भेजते हैं और हाफ टिफीन खाकर वह और पैसे बचाता है. जिससे वह पूरी मस्ती करता है. आयषा कहती है कि सिरियस लड़के अपनी पढ़ाई में ज्यादा मषगूल रहते है. परंतु कुछ बिगड़ैल लड़के है. जिनका काम यहां आकर आवारगी करना है. लड़कों में सिगरेट सहित नषा के अन्य स्त्रोतों मसलन अफीम, चरस, गांजा, षराब आदि का भी प्रचलन बढ़ा है. वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए छोटी मोटी आपराधिक गतिविधि में संलग्न हो जा रहे है. कोटा के पास झालावाड़ जिले में अफीम की खेती होती है. नषे के षौकीन लोगों को यह भी आर्कर्शित करता है. फिर भी कोचिंग क्लासेज से सफलता और उपलब्ध सुविधाओं के मद्देनजर कोटा छात्रों की पहली पसंद बना हुआ है. अब जयपुर, दिल्ली, मद्रास और पटना में भी कोचिंग के ब्रांच या नये संस्थान अपनी उपस्थिति सफलता पूर्वक दर्ज करवा रहे है. छात्रों को रफ्तार में भागती पेषन ने मषीन बना दिया है. उंचे संस्थानों ने उनके कल्पनाषीलता को फैक्ट्री के प्रोडक्टस के रूप में बदल दिया क्योंकि व उत्तर पुस्तिका पर अपनी जेहन में पूर्व अंकित उत्तर सीधा उडेल देते हैं न कि सोच कर स्वयं गढ़ते है. बच्चों के प्राकृतिक और नैसर्गिक संसाधनों पर अभिभावकों के सोच का बुलडोजर उनके सपने के पंख को लहूलूहान कर रहे हैं. स्वयं निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है और योग्य या सक्षम नहीं होने के बावजूद बच्चे अपने माता पिता के महत्वाकांक्षा को अपना मान स्वयं के कैरियर को स्थापित करने तथा अपने प्राकृतिक प्रदत्त क्षमताओं से दो दो हाथ कर बैठते हैं. इनके अंदर की कसम कस और कभी कभार उठे तूफान गले में फांस डाल देती है. अभिभावकों को जहां समझना होगा वही छात्रों को स्वयं निर्णय भी लेने होंगे क्योंकि जिंदगी की सीढ़िया आइआइटी और एम्स तक ही सीमित नहीं है |

(लेखक अर्ली मोर्निंग के वरीय पत्रकार है ) तस्वीर श्रोत-google