यहां मुर्दो के नाम आज भी कटती है जमीन की माल गुजारी रसीद !

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सहरसा/सिमरी बख्तियारपुर (ब्रजेश भारती):-जड़ जोरू,जमीन जौर का नही तो किसी और का यह कहावत आज हर किसी के जुवान पर आ जाती है।पर किसी ने कभी सोचा कि ये कहावत जमीन के मामले में क्यों कही जाती हैं। यहां में आपकों बताता हूं कि ये कहावत सिर्फ इसलिये जमीन के मामले में कही जाती है कि 114 वर्ष पूर्व जिस जमीन का सर्वे किया गया था आज आजादी के 70 दशक के बाद भी उसी सर्वे के आधार पर जमीन की नापी एवं खरीद ब्रिकी कि जाती हैं।वही वर्षो पूर्व भगवान एवं अल्लाह के प्यारे हो चुके बुजुर्गो के नाम आज भी हजारों एकड़ जमीन कि जमाबंदी चल रही हैं साथ ही जमाबंदी चसने की बजह से मालगुजारी रसीद भी उन्ही मुर्दो के नाम से कटती है इसका ये मतलब नही है कि उनके वंशज जमीन अपने नाम नही करवाना चाहते है लेकिन भूमि सुधार अधिनियम में इतना पेंच है कि कोई व्यक्ति आज के तारिख में जमाबंदी अपने नाम करवाना चाहे भी तो विभाग के द्वारा ईतने कागजात कि मांग कि जाती है कि उनके पसीने छुट जायेगें।

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भूमि सुधार कानून में पेंच की वजह से जमाबंदी कायम करने में छुट रहें है लोगों के पसीने

1902 ई के सर्वे पर आज भी होता है जमीन की मापी,जिसकी वजह से भूमि विवाद के मामले प्रति दिन होती है धटित

भू माफिया का राज है कायम,सोने के भाव बेची जा रही है अबैध व सरकारी जमीन

60 के दशक में हुआ सर्वे आज भी पूर्ण नही-

सन 1942 में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद सन 1954 में जमींदारो के द्वारा जमीन का रिर्टन के कागजात सरकार के पास जमा कर दिया।
सरकार ने आजादी के बाद सभी जमीनों का चकबंदी कर उसका सर्वे करवाया था जो कि 60 से 70 के दशक तक चला लेकिन इतनी शिकायतें सर्वे का हुआ कि आज भी नोट फाईनल कर रखा हुआ हैं। वही सरकार के पास उस सर्वे का कागजात नही है सुचना के अधिकार के तहत जब सुचना मांगी जाती है साफ तौर पर लिख कर दिया जाता है कि कागजात फटा हुआ हैं। अब सवाल ये है कि जब हाल सर्वे का कागजात फटा हुआ है तो फिर 1902 ई के सर्वे के कागजात का क्या हाल होगा।

जाने कौन थे यहा के जमींदार:-

अंग्रेजों के जमाने में बख्तियारपुर का जमींदार चौधरी नजीरूल हसन हुआ करते थे।(वर्तमान खगड़िया सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के दादा जी)। जानकारों की माने तो इनकी जमींदारी 75 हजार प्रति वर्ष लगान की वसूली का था जबकि बगल के सोनवर्षाराज के 3 लाख की लगान वसूली का था।

भूमि विवाद के मामले में वृद्धि-

60 के दशक का सर्वे का नोट फाईनल होना साथ ही पुराने सर्वे के कागजात का नही मिलना,साथ ही जमीन की आसमान छुटी दाम जिसकी वजह से आज भूमि विवाद के मामले दिन दुनी रात चैगुनी वढ़ रही है।आये दिन शहर हो या फिर गांव किसी भी प्रकार के विवाद में जमीन का मामला नही हो ऐसा नही हो सकता हैं। उस पर भू माफियाओं की बुरी नजर गिद्ध की तरह इस तरह के मामले पर नजर लगाये रखता है,जैसे ही जमीन के कागजात में कोई अरचन देखा ये लोग उसके पीछे लग जाते है।आने पौने भाव में उस गरीब की जमीन खरीद फिर उसी जमीन को करोड़ो के भाव बेच देते है।

रकवा से अधिक चल रही जमावंदी:-

जमीन से जुड़े जानकारो की माने तो बख्तियारपुर मौजा में करीब 2700 एकड़ जमीन है लेकिन अभी जो जमावंदी सरकारी रजिस्टर में चल रही है उसका कुल रकवा अगर जोड़ा जाय तो इससे अधिक रकवा का जोड़ सामने आ जायेगा।

तस्वीर : फाइल
तस्वीर : फाइल

सिमरी अंचल का बुरा हाल-

सिमरी बख्तियारपुर अंचल का सबसे पुरा हाल है खास करके बख्तियारपुर मौजा की जमीन का कोई भी पुराना कागजात सही सलामत नही मिल रहा है।जमीन के पेंचिदा मामले इस मौजा में ज्यादा देखने को मिल रहा हैं।अंचलाधिकारी धमेन्द्र पंडित कि माने तो वे कहते है कि हम क्या करें पुराना रिकार्ड है ही नही तो क्या करे बिना काजगात के क्या किया जा सकता है।खुलेआम जमीन के बिचैलियों के द्वारा सरकारी जमीन को खरीद एवं ब्रिकी कर करोड़पति बन रहें है अंचल प्रसाशन चाह कर भी कुछ नही कर सकता हैं।

भू माफिया का राज:-

बख्तियारपुर में भू माफिया राज कायम है तत्कालिन भूमि सुधार उपसमाहर्ता रासीद हुसैन के द्वारा वकायदा यहां कुछ भू माफियाओं का नाम चिन्हित कर सार्वजनिक किया गया था उनके कार्यकाल की चर्चा आज भी लोगो के जुबान पर होती है लेकिन वे कुछ कर पाते उससे पहले माफियाओं ने उनका तबादला करवा दिया गया।