सड़को पर कुत्ते का आतंक !

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मधेपुरा/ चौसा (संजय कुमार सुमन) : आवारा पशुओं का खुलेआम बेतरतीब विचरण से चौसा वासियों के लिए एक बड़ी समस्या है। लेकिन उससे भी बड़ी समस्या इन पशुओं द्वारा हिंसक होकर किसी व्यक्ति को काट लिये जाने की है। वैसे तो कुत्ता, बकरी, गाय, भैंस,गधा, खच्चर आदि कई तरह के जानवर सड़कों पर विचरण करते है। लेकिन इंसान को सबसे ज्यादा खौफ आवारा कुत्तों से होता है। क्योंकि कुत्ते द्वारा काटने के बाद एंटी रैबिज की दवा लेना अति आवश्यक होता है। आये दिन एंटी रैबिज लेने वालों मरीजों को चौसा के अस्पतालों में देखा जा सकता है। आये दिन अस्पताल में एंटी रैबिज की दवा लेने वालों मरीजों की भीड़ को देखा जा सकता है। अस्पताल के चिकित्सक के अनुसार सप्ताह में कम से कम 3 से 4 मरीज एंटी रैबिज के दवा लेने के लिए पहुंच रहे है। इनमें से सबसे ज्यादा संख्या वैसे मरीजों की होती है। जिन्हें कुत्ते ने काटा है। ऐसे मरीजों को यहां इलाज की पूरी व्यवस्था है। मात्र दो रूपये का रजिस्ट्रेशन स्लीप कटवाने के बाद मरीज का अस्पताल के ओपीडी में इलाज किया जाता है। फिलवक्त अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में एंटी रैबिज की दवा उपलब्ध है। जो मरीजों को जरूरत के अनुसार निशुल्क दी जाती है।

स्वास्थ्य प्रबंधक मु.शाहनवाज बताते हैं कि इस महीने में 20 वायल दवा का आवंटन विभाग से आया है। दवाओं की खपत को देखते हुये स्वास्थ्य विभाग से और भी एंटी रैबिज दवा उपलब्ध कराने की मांग की है। विभाग द्वारा जल्द ही दवा का आवंटन कर दिया जायेगा।उधर कई लोग बताते हैं कि कुत्ते का काटने का डर तो रहता ही है।इसके अलावे कुत्ते मुर्गा-मुर्गी और बकरी के छोटे बच्चे को भी गला दबा कर मार डालते हैं और खाने के लिये लेकर भाग जाते हैं। आवारा कुत्ता आजकल मुसीबत बना हुआ है। आवारा कुत्तों से प्रभावितों पर प्रति वर्ष यहां लाखों रुपये खर्च हो रहे है। इसका खुलासा आंकड़ा दवा में खर्च की राशि से जुड़ा है। यह मोटी राशि सरकारी खजाना से एंटी रैबिज सूई की खरीद पर खर्च की गयी है। एंटी रैबिज सूई की खरीददारी से अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रति वर्ष आवारा कुत्तो से करीब सौ से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। क्योंकि आवारा कुत्तों के काटने से पीड़ित मरीज को कम से कम तीन से चार वाईल दवा लेनी पड़ती है।

तस्वीर : सांकेतिक
तस्वीर : सांकेतिक

सूई लेने का पड़ता है साइड इफेक्ट

एंटी रैबिज सूई लेने का साइड इफेक्ट भी इंसानों पर पड़ता है। ऐसा चिकित्सकों का कहना है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की मानें तो सभी प्रकार के कुत्तों के काटने से सूई लेना जरुरी नहीं होता है। लेकिन यहां हल्की खरोंच लगने पर भी पीड़ित सूई दिलाने  अस्पताल में चले आते है।

कुत्ता कभी भी पालतू नहीं हो सकता, वह जंगली जानवर है

कुत्तों को लेकर अपना भ्रम दूर कर लें। कोई भी कुत्ता पालतू नहीं, वह खालिस जंगली जानवर है। हां, इंसानों के संपर्क में आकर उसका आचार, व्यवहार जरूर बदल जाता है। पालतू बन जाते हैं वे। जो खुले में घूमते हैं, उनकी फितरत नहीं बदलती। उनके अंदर का जंगलीपन कभी जाग सकता है। इंसानों के लिए खतरा बन सकते हैं। प्रखंड पशु पदाधिकारी डा. गगन कुमार झा के अनुसार, कुत्ता जंगली जानवर की श्रेणी में आता है। आबादी क्षेत्र के कुत्ते इंसानों के बीच रहकर काफी हद तक इंसानों से फ्रेंडली हो जाते हैं। यहां पर उन्हें भोजन भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

खुले में रहने वाले इंसानों के लिए फ्रेंडली नहीं हो पाते

जो कुत्ते जंगलों, खुले आदि में रहते हैं, वे इंसानों के लिए फ्रेंडली नहीं हो पाते। शिकार करके खाना उनकी आदत में है। ऐसे में जब कभी उन्हें आबादी से दिक्कत होती है, कोई इंसान उनके आसपास होता है तो वे उस पर हमला कर देते हैं। एक बार इंसानी खून उनके मुंह लग जाता है तो वे आदमखोर प्रवृत्ति के हो जाते हैं। शहर के कुछ आवारा कुत्ते जरूर अपवाद होते हैं। वे इंसानों के करीब रहकर कुछ हद तक पालतू होने की श्रेणी में आ जाते हैं। हां, मौका लगने पर हमलावर होने से पीछे नहीं हटते।