चालु कर जेनरेटर : लोगों की जान सांसत में !

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मधेपुरा/चौसा (संजय कुमार सुमन) : सूबे के बिजली संकट से चैसा भी अछूता नही है। बिजली विभाग की अनदेखी के कारण अंधेरे से जारी जंग में लोग अपनी जान की भी परवाह नहीं करते। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बांस की बल्ली पर नंगे तारों से विद्युत सप्लाई होती है जेनरेटर से सिंगल फेज बिजली ।
जिससे घर घर में जलता है सीएफएल बल्व। इससे खर्च भी कम आता है।
जिसके कारण ग्रामीण क्षे़त्रों में यह ब्यवसाय काफी फुल फल रहा है। रोज रोज के आखं मिचैनी से तंग आकर ग्रामीणों ने इसका हल जेनरेटर के सिंगल फेज के रूप में खोज निकाला हैं।
ग्रामीण क्षे़त्रों में लोगों को आम तौर पर शाम से रात के दस बजे तक इसकी उपयोगिता रहती है। जबकि इन इलाकों में शाम होते ही बिजली गुल हो जाती है। आती है तो रात के दस बजे के बाद जब लोग सो जाते है या सोने की तैयारी में होतें हैं। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए ग्रामीणों में यह सेवा काफी लोकप्रिय हो रही है। कहते है आवश्यकता अविष्कार की जननी है। संचार तकनीक के इस युग में गांव गांव तक घर घर में टेलीविजन सेट उपलब्ध है,तो हर घर में मोबाइल है यह दीगर बात है कि इन गावों में दूर दूर तक बिजली का नामोनिशान नहीं है। सुदूर गांव भी जेनरेटर के सहारे मामूली खर्च पर हर घर में शाम से लेकर रात 12 बजे तक सीएफएल की रौशनी जगमगा रही है। एक बल्व को जलाने के लिए उपभोगता को डेढ लीटर केरोसिन तेल देना पडता है जिसका बाजार मूल्य 45 से 50 रूपये के आसपास होता है । एक जेनरेटर सेट से डेढ सौ लोंगो को कनेक्शन दिया जा सकता है। जेनरेटर सेट से निकलने वाले आउटपुट वोल्टेज में से एक फैज को डायोड केे सहारे ग्राउंड कर दिया जाता है।ं मा़त्र एक फेज से पूरे गांव में वायरिंग की जाती है। एक फेज होने की वजह से जेनरेटर पर लोड भी नहीं पडता है। अब इसके प्रसार पर ध्यान दिया जाय तो इससे पग पग पर खतरा है। कारण नंगे तारों से बांस के बल्ला पर इसकी आपूर्ति उपभोक्तातों के घरों तक की जाती है। जो खतरनाक ही नहीं जानलेवा साबित होता है ।

तस्वीर सांकेतिक
तस्वीर सांकेतिक

जेनरेटर की करंट से कई लोंगो की मौत अब तक हो चुकी है। सुदूर ग्रामीण क्षे़त्रों में इससे लोंगो को रोजगार भी मिल रहा है। इससे होने वाले प्रदूषण से आमलोग अभी वाकिफ नहीं है। मोबाईल चार्ज करने के लिए जेनरेटर पर इन ग्रामीणों इलाकों के लोग सर्वाधिक निर्भर है। जेनरेटर चालकों ने तो मोबाईल चार्ज करने का रेट तय कर रखा है। प्रति मोबाईल पांच से दस रूपये और सभी घरों में कम से कम दो मोबाईल तो हे ही। रूपये नही ंतो बीपीएल या अन्य मदों में मिलने वाले किरासन तेल जेनरेटर की भूख मिटाता है। जेनरेटर चला कर जो उगाही होती है वह तो है ही,उसके बाद बचे तेल उन्हीें गरीबों को ऊंची कीमत पर बेच देते हैं ।
राजीव गांधी विद्युतिकरण योजना का लाभ भी इन क्षे़त्रों में सही रूप से नहीं मिल पाया है। नतीजा है कि जेनरेटर सेवा ग्रामीण क्षे़़त्रों में स्थायी रूप ले रही है। इस प्रकार की विद्युत सप्लाई से समाज के बुद्धिजीवी वर्ग संभावित खतरे से सशंकित रहते है। विभागीय अभिंयता कुछ भी बोलने से परहेज करते है। दिनानुदिन इसके उपभोक्ताओं की संख्या बढती जा रही है ।