हर खेत को पानी : पहले पीने का पानी तो दें सरकार – राजेंद्र सिंह

2294

सूखे को लेकर कई स्तर पर चर्चा शुरू हुई है। आम लोग पानी की कमी से परेशान है, किसान पेयजल से लेकर सिंचाई के लिए खेतों में पानी की बांट जोह रहा है। टैंकर माफिया का हमेंशा की तरह दसों उंग्ली घी में है। यदि आप खरीद सकते हैं तो पीने की पानी की कोई कमी नहीं, बोतल बंद पानी जो है।

koshixpress desk गांधी ने जिस जगह से चंपारण सत्याग्रह शुरू किया था, उसी चंपारण से जल पुरुष राजेंद्र सिंह जी ने जल सत्याग्रह कायम किया है! जल सत्याग्रह कायम करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान देश मे जल सत्याग्रह का गहरा प्रभाव है जल संकट के कारण मानव ऒर बैजुबान पशु व्याकुल हो रहे है ! २१ सदी की ये पहली चेतावनी है जब देश मे लातूर, बुंदेलखंड, मराठवाड़ा, मालवा सहित कइ क्षेत्र भयानक सुखे के दोर से गुजर रहे है! पानी के लिये लोग परेशान हो रहे है! इश का कुछ कारण जल दोहन की सहीता है जिसका एक उपाय जल संरक्षण है !

rr-singh-650x445अब तो वाटर मैन राजेंद्र सिंह भी बोतल का पानी पीने लगे हैं। कहते हैं, 30 लाख लोगों को बोतल का पानी छुड़ाया,लेकिन अब हम खुद मजबूर हैं, पीने को दूसरा पानी है ही नहीं। हालांकि वे आशान्वित हैं अच्छे दिन आएंगे, जरूर आएंगे लेकिन नारों से नहीं समाज को साथ लेकर।

उन्होंने चम्पारन जिले के चम्पतिया गाँव के प्राथमिक विद्यालय गंगा वन मे चम्पारन सत्याग्रह १०० वर्ष के उपलब्ध मै जल सत्याग्रह कार्यक्रम को सम्भोदित करते हुए कहा सरकार और समाज अभी चेत जाये वरना जल संकट के कारण इतने हिंसा बढेगे जिन्हें रोक पाना किसी के हाथ में नही होगा और कानून व्यस्था ख़राब होगी, जिसका उदाहरण लातूर सब के सामने है! यह यात्रा अभी तक अत्यधिक सूखाग्रसित क्षेत्रों का भ्रमण कर कर चुकी है।

चंपारण से आगे बढ़ते हुए राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में जन जल जोड़ो अभियान उत्तराखंड, महाराष्ट्र, तेलांगना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश के रास्ते यात्रा दिल्ली के दरबार में दस्तक देने वाली है। इस यात्रा के बाद जलपुरूष का कहना है कि लातूर समेत देश के 70 से भी ज्यादा जिले सूखे प्रभावित हैं। लेकिन बड़ी बात यह है कि यह सूखा मानसून या बारिश के कमी से नहीं, मानव निर्मित हैं। सरकार ने समाज के जल प्रबंधन के काम को अपने हाथ में लिया और जो काम होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। विकास के नाम पर संसाधनों का अभूतपूर्व दोहन के कारण, जीवन का सबसे जरूरी संसाधन पानी का भंडारण लगभग समाप्ति के कगार पर है, लेकिन नमामी गंगे और नदी पुर्नजीवन मंत्रालय बना देने के बाद भी सरकार के पास नीतिगत स्तर पर कोई योजना नहीं दिखती जिससे जीवन रक्षक पानी को बचाया जा सके।

pani-1

राजेंद्र सिंह कहते हैं…देश के 13 राज्यों के 254 जिलों की लगभग 54 करोड़ से अधिक की आबादी सूखे की चपेट में है। दिन-प्रतिदिन हालात सिथति खराब होती जा रही है। पहले अल्प वर्षा, सूखे के कारण किसानों को फसल उत्पादन से निराशा हाथ लगी और अब पेयजल के गहराते संकट ने किसानों को पलायन करने और जानवरों को खुला छो़ड़ने पर मजबूर कर दिया है। कर्ज में डूबे किसान एवं फसलों से मिली निराशा ने किसान आत्महत्या के केसों में बढ़ोत्तरी कर दी है। महाराष्ट्र एवं बुन्लेदलखण्ड क्षेत्र के हालात बदतर हो चले हैं। पानी की मांग और आपूर्ति में बड़ा अन्तर आ चुका है, कर्इ इलाकों में हिंसक घटनाओं का भी जिक्र हुआ है। गांवों के पेयजल स्रोत एवं छोटी नदियों सूख चुकी हैं। पानी के अभाव में जानवर दम तोड़ने लगे हैं। जिस गति से भू-जल स्तर नीचे गिर रहा है उससे प्रतीत होता है कि आने वाले समय में भीषण जल संकट का सामना देशवासियों को करना पड़ेगा।

वे सवाल उठाते हैं कि देश की सरकार खाद्य सुरक्षा की बात करती है लेकिन जल सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं है। बिना जल सुरक्षा के खाद्य सुरक्षा कैसे संभव है। उन्होंने कहा कि भले ही सरकार हर खेत को पानी की बात कह रही है,लेकिन जमीन पर लोग पीने के पानी को मोहताज हैं।

क्या हो उपाय

  • राजेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार यदि सही मायने में सबको पानी देना चाहती है नदियों को पुर्नजीवित करने का कानून बनाना पड़ेगा, सिर्फ मंत्रालय बना देने मात्र से स्थिति नहीं सुधरेगी। उन्होंने कहा कि नदी के जमीन का इस्तेमाल सिर्फ नदी के लिए उसका लैंड यूज न बदला जाय।
  • धरती का पेट खाली है। जब तक धरती का पेट खाली होगा, तबतक नदी में पानी कैसे आएगा। भूजल संरक्षण, और भूजल पुर्नसंभरण का काम किया जाए। नदी और सीवर को अलग किया जाए।
  • राज्य सरकारें जल सुरक्षा अधिनियम बनायें।
  • जिला सरकार अर्थात पंचायत सरकार पंचायत और नगरनिगम के स्तर पर पानी को रोकने का काम करे।

सूखे से उत्पन्न हुए भीषण हालात एवं जल सुरक्षा अधिनियम लागू किए जाने की मांग को लेकर देश भर के जल सुरक्षा पर करने वाले लोग बड़ी संख्या में 5 मर्इ 2016 को दिल्ली में जमा होंगे ताकि समाज के स्तर पर हो रहे काम और सरकार के स्तर पर आ रही ​कमियों को लेकर चर्चा की जा सके।

श्रोत- (http://panchayatkhabar.com)