बेपानी होते गांव : बेपरवाह होता समाज,सोती सरकार !

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 पानी की जंग में..हम सब संग में। बंदूक नहीं खुदाई चाहिए..हर हाथ को काम चाहिए। ईश्वर का जल..ईश्वर का थल..ईश्वर का आकाश है..ना यह तेरा..ना यह मेरा..फिर क्यों तेरा राज है। जी हां राजघाट से लेकर जंतर—मंतर तक जल सत्याग्रिहों के बीच से रूक रूक कर लगते नारे। सबके चेहरे पर बस एक ही उम्मीद..एक ही सवाल..आखिर बिन पानी कैसे जिंदगी आगे चलेगी। बेपानी गरीबों को कौन कर रहा है। बुंदेलखंड के टीकमगढ से आई 120 महिलाओं की टोली में 60 वर्षीय नन्नी बाई भी है। कहती हैं न कुआं में पानी है, न तालाब में इंसान तो इंसान जानवर भी पानी को मोहताज हैं। पेड़ पौधे मर रहे हैं। यह पूछने पर कि अखिलेश यादव तो कहते हैं प्रदेश में पानी की कोइ कमी नहीं है। कहती हैं जब वहां मरना है तो यही मंर जायेंगे। बहुत लोगों ने गावं छोड़ दिया। हम भी छोड़ देंगे।

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जंतरमंतर पर इसी तरह की भावना लिये देश के 13 सूखा प्रभावित ईलाकों से 4000 लोग जुटे हैं। जिसमें महिलाएं भी हैं,बुजुर्ग भी,नौजवान भी..पानी पर काम करने वाले भी,जनसंगठन के लोग भी। इन सबने राजघाट से लेकर जंतर—मंतर तक जल सत्याग्रह यात्रा की। जलपुरूष राजेंद्र सिहं कहते हैं कि यह राज्य की जिम्मेवारी है कि वह सभी को पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करे। लेकिन सिर्फ राज्य ही नहीं समाज और समुदाय को भी पानी से जुड़े मुद्दों पर भागीदारी करनी चाहिए। वे कहते हैं कि वर्तमान सरकार गंगा के साफ सफाई की बात पहले करती रही है सही मायने में जल प्रबंधन का काम देश में शुरू नहीं हुआ है। उन्होंने साफ कहा कि नदी भूमि के लैंड यूज में परिवर्तन सिर्फ पानी के लिए ही किया जाना चाहिए।आज नदियों की जमीन के लैंड यूज बदले गये हैं। लेकिन नदी और नदीयों के जलसंभरण क्षेत्र वाली जमीन का इस्तेमाल केवल पानी के काम के लिए ही उपयोग किया जाना चाहिए। जल संचयन का काम प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। साफ पानी और नाली से निकलने वाले पानी का किसी कीमत पर एक में न मिले। इससे पेयजल नाली वाले जल में तब्दील हो जाता है। आज निजी कंपनियां पानी के साफ सफाई के काम मे लगाई जा रही हैं जो कि काफी महंगी है।

एकता परिषद के संस्थापक  राजगोपाल बातचीत में कहते हैं कि यह साफ नजर आ रहा है कि पानी को लेकर आपात स्थिति है। यह सिर्फ नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव की लड़ाई नहीं है। ता​त्कालिक उपाय जहां से संभव हो किया जाना चाहिए ताकि लोगों को राहत मिले। लेकिन ये फौरी राहत है समस्या का समाधान नहीं। सरकार को चाहिए कि मनरेगा के पैसे को जल्दी रिलिज किया जाए और इसका इस्तेमाल गांव के तालाब और नदी को जीवित रखने के लिए किया जाए। नदियों को टूरिज्म से मुक्ति दिलायें। आज गांव के तालाब और पोखर पर बड़े लोगों का कब्जा है। बड़ी कंपनियां हो या तावरतोड़ बोरबेल से निकासी कर रहे किसान जो भी पानी निकालता है, वह ऐसी व्यवस्था कि जितना पानी निकालता है, उसको कैसे संभरन किया जाए इसकी भी व्यवस्था किया जाए। लेकिन सरकार के करने से यह काम नहीं हो पाएगा। इसमें सरकार और समाज दोनो को साथ आना होगा। हमने समाज को लेकर प्रयास शुरू किया है। लातूर में,उस्मानाबाद,टीकमगढ़,छत्तरपुर आदि में समाज के लोगजन अभिक्रम का काम शुरू है। लेकिन यह तबतक सफल नहीं होगा,जबतक अनुकूल कानून नहीं बने। यह काम सरकार का है। यदि हम नदी, तालाबों का संरक्षण नहीं करेंगे तो प्रकृति मर जाएगी। और प्रकृति मरेगी तो हम सब कैसे बचेंगे। यह काम ग्रामसभा और पंचायतों को करना है। दिल्ली वालों के भरोसे यह काम नहीं छोड़ा जा सकता। उनके भरोसे 5 लाख गांव के लोगों को कैसे पानी मिलेगी। गांधी जी कहते थे 5 लाख स्वावलंबी गांव बनाना है तभी भारत बनेगा। और आप सोचो कि पांच लाख स्वावलंबी गांव बिना पानी का कैसा होगा। पंचायत प्रतिनिधियों को मुख्य जिम्मेवारी देनी होगी, समस्या के जड़ में चोट करना होगा तभी बात बनेगी। पंचायत पर स्तर वाटर एडुकेशन देना होगा तभी बात बनेगी। पानी ही जीवन है,सबलोगो को सीखना है।

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योगेंद्र यादव कहते है कि सरकार को पिछले अक्टूबर में ही पता चल गया था कि देश में सूखे की स्थिति है लेकिन सरकार अब सूखे के समय तालाब खोदने का बाट जोह रही है। उन्होने कहा कि इस देश में जल और हल को साथ मिलकर काम करना होगा।

श्रोत –http://panchayatkhabar.com से संतोष कुमार सिंह की रिपोर्ट