हुंकार : आनंद मोहन पुर्व सांसद रचित कविता !

 हुंकार …..

मौत और सलाखों से कब तलक डराओगे,

गाजियों के सामने आंधियां नही अड़ती |

शाहीन के सामने परवाज कहा टिकता है,

नाहर की गर्जन पर बिल्लियाँ नहीं रूकती |

मर्द निकल पड़ता है,जब भी अपनी मंजिल को

कड़क भूल राहों में बिजलियाँ कहीं छुपती |

सुरमई सुबह जब सुर्ख आफ़ताब उगता है,

रात जितनी काली हो कालिमा नहीं टिकती |

झुठे जाल-फ़ांस में कितने दिन उलझाओगे ,

कि काठ की हड्डियाँ ,दुबारा नहीं चढती |

झुठ कहाँ  सांच की आंच झेल पाएगा ,

रेत के समन्दर में कश्तियाँ नहीँ चलती |

क्या तलाश करते हो इन सुलगती आँखों में ,

जहाँ छिटकती चिंगारी ,आँसू वहां कहाँ टिकती |

सींखचो में डाल तुम मजबूर नहीं कर सकते,

कि मर्दों के ‘लोगश’ में मजबूरियाँ नहीं होतीं |

हथकड़ी से तुम मुझको किसलिए डराते हो,

शेर की कलाई में चूड़ियाँ नहीं होतीं |

जब चुनौती भेजोगे,हम जरुर आएँगे,

पांव में हवाओं के बेडियां नहीं होतीं |

(श्रोत – सेंट्रल जेल,भागलपुर (पूर्व सांसद आनंद मोहन )