मिसाल – बच्चों को मुफ्त में कर्मकांड की शिक्षा देते है शिक्षक शत्रुघ्न चौधरी !

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सहरसा-(desk) शिक्षा के व्यवसायीकरण के दौर में जहां गुरुकुल की मर्यादा छिन्न होती जा रही है। वहीं कुछेक शिक्षक अभी भी हैं जो इस पवित्र और मर्यादित परम्परा को बरक़रार रखे हुये हैं। इन्ही में एक शिक्षक है शत्रुघ्न चौधरी जो पिछले पांच वर्षों से लुप्त हो रही संस्कृत की शिक्षा करीब सवा सौ छात्र  छात्राओं को मुफ्त में दे रहे हैं। शिक्षा के साथ साथ शिक्षक छात्रों को मुफ्त में वस्त्र और पुस्तक भी देते है। इसके लिये शिक्षक श्री चौधरी को कही से भी आज तक आर्थिक सहायता नहीं मिली है। कलावती उच्च विद्यालय बनगांव में शिक्षक शत्रुघ्न चौधरी ने बताया की वर्ष 2011 के मकर संक्रांति के दिन उनके मन में यह विचार आया कि क्यों नहीं बच्चों को वैदिक कर्मकांड की शिक्षा दी जाये। तब से यह सिलसिला जारी है। अब स्थिति यह हो गयी है कि इलाके में होने वाले किसी भी सार्वजनिक समारोह का शुभारम्भ इन्ही बच्चों के वैदिक मंत्रोच्चार से होता है। खासबात यह है बैदिक कर्मकांड की शिक्षा लेने वाले सवा सौ छात्रों में करीब चालीस छात्राएं हैं। जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर महिषी स्थित उग्रतारा स्थान के साधना भवन में प्रतिदिन ऐसे दर्जनों बच्चों को कर्मकांड की शिक्षा प्राप्त करते देखा जा सकता है। शिक्षक श्री चौधरी बताते है की स्कूल जाने के पहले और फिर आने के बाद एक से दो घंटे तक कि कर्मकांड की नियमित शिक्षा दी जाती है। शिक्षक की इस उदार भावना के बदौलत संस्कृत की मुफ्त में मिल रही शिक्षा को आर्थिक मदद भले ही नहीं मिला हो लेकिन इलाके में इस प्रशंसनीय कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा की जाती है। बकौल शिक्षक चौधरी उग्रतारा महोत्सव के उद्घाटन के लिये जब पहली बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महिषी आये तो उन्होंने छोटे छोटे बच्चों के मुंह से धाराप्रवाह वैदिक मंत्रोच्चार सुनकर काफी खुश हुए थे। उग्रतारा वेद विद्या केंद्र के तहत कर्मकांड की शिक्षा लेने वालों में आठ छात्र छात्राओं को इस बार मध्यमा और तीन को उपशास्त्री का परीक्षा दिलवाया गया। इतना ही नहीं उग्रतारा वेद विद्या केंद्र के एक छात्र राजकुमार नासिक में मुफ्त शिक्षा ग्रहण कर रहे है। शिक्षक चौधरी के मुताबिक राजकुमार को संगीता का सैंतीस अध्याय कंठस्थ है। संगीता वेद का मूल ग्रंथ है। कभी माहिष्मती के नाम से जाने वाले महिषी की पहचान संस्कृत से रही है क्योंकि भारती मंडन की यह जन्म भूमि है जहां तोता से लेकर पनिभरनि तक के संस्कृत में वार्तालाप का सुनहरा इतिहास रहा है। ऐसे में शिक्षक शत्रुघ्न चौधरी का संस्कृत के प्रति इतनी अटूट आस्था उनकी विरासत का संस्कार माना जा रहा है।