क्षणिकाएं

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खाकी भी “खा” है

खादी भी “खा” |

“खा-खा का खौफ अब खाने लगा है,

गाँधी का “खा” अब भुनाने लगा है |

मेरे जनतंत्र में हों ये खुबियां,

वोटर सब मुर्ख रहें –

सजी रहे टोपियां |

अपराधी सब बेच रहें _

निर्दोष खायें गोलियां |

गाँधी की लाठी,मापें नही पगडंडीया |

स्वराज अब स्वः राज है,

पूरी तस्वीर ही ‘कोलाज’ है,

यहाँ अस्तित्व भी मोहताज है,

कही नक्सली, कही आतंकी

और कही गुंडाराज है |

गाँधी के इस देश में

धोखेबाज ही सिर का ताज है |

(मुक्तेश्वर मुकेश की रचना रंग-बदरंग से )