निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक हलकान !

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निजी स्कूलों में पढ़ाई को एक व्यसाय के रूप में तब्दील कर दिया गया है। जिसका सीधा असर अभिभावकों पर पड़ रहा है, जो स्कूलों को विद्या का मंदिर मानते है | नामांकन से लेकर पाठ्य सामग्री एवं परीक्षा फॉर्म भरने तक सरेआम शिक्षा विभाग के नियमों की अवहेलना की जा रही है।सारी स्थिति को जानते हुए समझते हुए भी विभागीय अधिकारी बेबस बने हुए हैं। जिससे निजी स्कूल संचालकों की मनमानी बढ़ती जा रही है। निजी स्कूलों के नर्सरी से लेकर 10 वी -12 वी तक के किताबो को हर वर्ष बदल दिया जाता है | किताबो को बदलने का नतीजा यह होता है की अभिभावकों को साल-दर-साल किताबो को रद्दी के भाव बेचने को मजबूर होना पड़ता है,इतना ही नहीं यदि किसी छात्र का भाई 9 वी वर्ग का छात्र है और उसका बड़ा भाई 10 वी का छात्र है तो 10 वी में जाने के बाद उसके भाई कि किताब उसके लिए कोई मायने नही रखता,क्योकि निजी स्कूलों के मनमानी के कारण हर वर्ष किताब सहित प्रकाशक बदल दिया जाता है |जिस कारण अभिभावको को नई किताबे खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है ,आकड़ो पर ध्यान दे तो एक निजी स्कूलों में कम-से कम 700-800 बच्चें होते है,एक बच्चों कि क़िताबे 2500 से 4500 तक खरीदने में खर्च होते है,वो भी कुछ खास दुकानों से और यह किताबे सिर्फ स्कूल प्रबंधन द्दारा नामित दुकानों में ही मिल पाता है |सूत्रों की माने तो हर वर्ष किताबो को बदलने से स्कूल प्रबंधक को वितरक,प्रकाशक द्दारा 30से 40 प्रतिशत कमीशन तक दिया जाता है वो भी एडवांस में | लेकिन विडंबना यह है की जब कोई अभिभावक या छात्र उस खास दुकान से किताब खरीदता है तो उसे छुट तो दूर प्रिंट दाम में बेचा जाता है |

निजी स्कूलों की मनमानी पर लिखी पोस्ट
निजी स्कूलों की मनमानी पर लिखी पोस्ट

 मालुम हो की पुर्व मे भी सहरसा सहित आस-पास के जिलों में विभिन्न राजनीतक दलों,छात्र संघठनो द्दारा इस मुद्दे को उठाया गया था ,लेकिन वही धाक के तीन पात वाली कहाबत हो गई |

मालूम हो की निजी स्कूलों में ही हर वर्ष किताबो को बदलने का गोरखधंधा बदस्तूर जारी है ,इसके बिपरीत सरकारी स्कूलों में कई-कई वर्षो तक एक ही प्रकाशको कि किताबे बच्चों के लिए चलाया जाता है |

निजी स्कूलों के इस मनमानी से त्रस्त अभिभावक सत्यप्रकाश ने अपनी बात को सोशल मीडिया फेसबुक के माध्यम से अभिभावको को एक इस मुद्दे पर एक जुट करने की बात तक कर दिए | उनके अनुसार अभिभावक या छात्रों को विद्यालय प्रबंधन को किताबो की लिस्ट देते हुए किताब मिलने की जगह तक बता दिया जाता है ,सब से खास बात यह है की लिस्ट की किताब खास दुकान के अलावे किसी और दुकानों में नहीं मिल पाता |

कुछ भी हो निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक परेशान तो है फिर भी उनके समक्ष बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की मज़बूरी बनी है यही कारण है की अभिभावक भी मज़बूरी में बच्चों कि भविष्य को देखते हुए इस बारे में कुछ भी करने या कहने को तैयार नहीं होते है |