कन्हैया एक बुलबुला या नयी छात्र राजनीति की आहट ?

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भक्त’ और ‘अभक्त’ में देश विभक्त है! और तप्त है! इक्कीस महीनों से इक्कीसवीं सदी के इस महाभारत का चक्रव्यूह रचा जा रहा था. अब जा कर युद्ध का बिगुल बजा. लेकिन चक्रव्यूह में इस बार अभिमन्यु नहीं, कन्हैया है. तब दरवाज़े सात थे, इस बार कितने हैं, कोई नहीं जानता! लेकिन युद्ध तो है, और युद्ध शुरू भी हो चुका है. यह घोषणा तो ख़ुद संघ की तरफ़ से कर दी गयी है. संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी का साफ़-साफ़ कहना है कि देश में आज सुर और असुर की लड़ाई है.

तो सुर कौन? और असुर कौन? और सुर-असुर के युद्ध में समुद्र मंथन भी होता है. विष भी निकलता है, अमृत भी. मंथन होगा क्या? कैसा होगा मंथन? विष कौन पियेगा? कोई नीलकंठ बनेगा या नहीं? अमृत किसके खाते में जायेगा? और कोई राहू-केतु भी होगा क्या? प्रश्न बहुत हैं. उनके उत्तर देने के लिए हमारे पास कोई यक्ष नहीं.

कौन सुर ? कौन असुर ?

तो ‘भक्त’ और ‘अभक्त’ में तो कोई कन्फ़्यूज़न है नहीं. परिभाषा स्पष्ट है कि ‘भक्त’ किसे कहते हैं और ‘अभक्त’ क्या होता है. यह भी तय है कि जो ‘भक्त’ है, वह निस्सन्देह ‘देशभक्त’ है. और जो ‘अभक्त’ है, वह क्या है? वैसे फ़ेसबुक पर अपने मित्र नीलेन्दु सेन की बड़े मार्के की सलाह थी कन्हैया को, ‘जो भक्त नहीं, वह देशभक्त नहीं कन्हैया बाबू!’

यानी ‘देशभक्त’ कहलाना हो तो ‘भक्त’ बन जाओ! तो समझ ही गये होंगे आप कि देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट बाँटने वाला दफ़्तर कहाँ है. और सुर-असुर का मतलब? वह आप अपने विवेक से तय कर लीजिए! या फिर संघ वालों से पूछ लीजिए कि वह ‘सुर’ किसे मानते हैं और ‘असुर’ किसे? आख़िर यह जुमला तो उन्हीं का आविष्कार है!

संघ क्यों है इतनी जल्दी में ?

2013 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने एक भाषण में कहा था कि भारत अगले तीस साल में हिन्दू राष्ट्र बन जायेगा. तब शायद बहुत लोगों ने इसे बिलकुल गम्भीरता से नहीं लिया होगा, लेकिन मैं तभी से लगातार लिखता आ रहा हूँ कि यह मोहन भागवत का ‘जुमला’ नहीं, बल्कि उनका ठोस राजनीतिक आकलन हैं, जिसके ठोस कारण धरातल पर दिख रहे हैं. हालाँकि अब पिछले इक्कीस महीनों को देख कर मुझे तो लगता है कि तीस साल तो क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शायद हिन्दू राष्ट्र को लेकर वाक़ई बड़ी जल्दी में है. शायद इसीलिए ‘सुर-असुर युद्ध’ की एकतरफ़ा घोषणा संघ ने इतनी जल्दी कर दी.

एकतरफ़ा लड़ाई की उम्मीद

और शायद संघ को उम्मीद है कि यह लड़ाई एकतरफ़ा ही रहेगी और आसानी से जीत ली जायेगी. क्योंकि मामला राष्ट्रवाद से जोड़ा जा चुका है, लोगों में राष्ट्रप्रेम का ज्वार जगाया जा चुका है और इस राष्ट्रवाद को आसानी से ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ की तरफ़ मोड़ा जा सकेगा. संघ को लगता है कि अब भी मौसम उसके लिए साफ़ है क्योंकि विपक्ष इक्कीस महीनों में संसद में भले गरजा हो, कुछेक चुनावों में भले ही कुछ जगहों पर कड़कड़ा कर चमका भी हो, लेकिन वह बरस तो बिलकुल नहीं सका. जनता फ़िलहाल विपक्ष को केन्द्र में सत्ता सौंपने को तैयार नहीं दीखती. न उसके पास विश्वसनीयता है, न नारे हैं, न कार्यक्रम हैं, न नेता है और न दिशा है. इससे बेहतर स्थिति भला और क्या होगी? और मोदी हवा का जो ढलता हुआ रुख़ है, उसे देखते हुए कौन जाने ऐसा अनुकूल मौसम कब तक रहे, इसलिए जल्दी-जल्दी सब कर डालो, यही सोच कर शायद संघ इतनी जल्दी में है. वरना तीस साल में तो अभी पूरे सत्ताइस साल बाक़ी हैं.

लेकिन यह लड़ाई क्या वाक़ई एकतरफ़ा होगी या वैसी दिख रही है? कम से कम रिहाई के बाद दिये गये कन्हैया के भाषण से तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता. छात्रों की ऐसी भारी भीड़, टीवी चैनलों पर ऐसी ज़बर्दस्त कवरेज और फिर ऐसा सधा हुआ भाषण, ऐसी ज़बर्दस्त राजनीतिक सूझबूझ, और यह समझ कि आगे की लड़ाई कैसे और किन मुद्दों पर लड़नी है, रणनीति क्या होगी, तरीक़े क्या होंगे, हथियार क्या होंगे, कन्हैया के भाषण में सब था. और यह इरादा भी साफ़ था कि वह इस लड़ाई में कूद चुका है.

कहीं मुसीबत न बन जाये कन्हैया ?

और आज यह सवाल हर तरफ़ चर्चा में है कि कन्हैया कहीं मोदी सरकार की नयी मुसीबत न बन जाये? जेएनयू के आभामंडल को इस तरह निशाना बना कर दिल्ली में वामपंथ की ‘नर्सरी’ को ढहा देने की संघ, बीजेपी और मोदी सरकार का तीर कहीं उलटा तो नहीं लौटने वाला है? और क्या ‘काँग्रेस-मुक्त भारत’ की बात के बाद अब ‘वाम-नाश’ की अकुलाहट में ‘परिवार’ और मोदी सरकार से ऐसी ग़लती हो गयी, जो बहुत भारी पड़ सकती है?

कन्हैया का साफ़-साफ़ आरोप है कि रोहित वेमुला के मामले को लेकर छात्रों में फैली बेचैनी को नेपथ्य में ढकेलने के लिए जेएनयू को निशाना बनाने की साज़िश रची गयी. जेएनयू प्रकरण में अब तक जो बातें सामने आयी हैं, उनसे सवाल तो कई उठते हैं. पहला तो यही कि 9 फ़रवरी को जेएनयू में मीडिया को किसने बुलाया? जिसने कार्यक्रम का आयोजन किया, उसने तो नहीं बुलाया! कार्यक्रम किसी और संगठन का हो, तो मीडिया को एबीवीपी के लोग क्यों बुलाने जायें? क्या उन्हें पहले से पता था कि कार्यक्रम में देश-विरोधी नारे लगेंगे? और अगर पता था तो यह भी पता होगा कि ऐसे नारे कौन लगायेगा? तो उन्होंने पुलिस को पहले से इसकी सूचना क्यों नहीं दी? और नारे लगने के तीन दिन बाद तक इस घटना को उजागर क्यों नहीं किया गया? फ़र्ज़ी वीडियो किसने बनाये? पुलिस ने अब तक यह जाँच करने की कोशिश नहीं की कि वे नक़ाबपोश लड़के कौन थे, जिन्होंने ऐसे नारे लगाये? पुलिस ने यह जाँचने की भी कोशिश नहीं की फ़र्ज़ी वीडियो किसने बनाये और किन न्यूज़ चैनलों ने उसे बिना जाँचे-परखे क्यों चला कर लोगों को भड़काने की कोशिश की. ख़ास कर तब, जबकि एक चैनल का एक पत्रकार यह आरोप लगा कर इस्तीफ़ा दे चुका है कि उससे वीडियो में छेड़छाड़ करने के लिए कहा गया. क्या यह जाँच का मुद्दा नहीं है? और अगर पुलिस इस सबकी जाँच की ज़रूरत नहीं समझती तो साफ़ है कि जेएनयू के मामले के पूरे सच को दबाया जा रहा है.

कन्हैया एक बुलबुला या नयी छात्र राजनीति की आहट ?

यह सब बातें अब सामने हैं और ज़ाहिर-सी बात है कि कन्हैया इन मुद्दों को लेकर छात्रों के बीच जायेगा. फ़िल्म इंस्टीट्यूट, हैदराबाद विश्विद्यालय, फिर जेएनयू और उसके बाद एएमयू यानी अलीगढ़ मुसलिम विश्विद्यालय को लेकर शुरू हुए ताज़ा विवाद के बीच क्या मोदी सरकार ने कन्हैया के रूप में एक नये छात्र नेतृत्व को रातोंरात नहीं पैदा कर दिया? कन्हैया का एजेंडा साफ़ है—समानता, समाजवाद और सेकुलरिज़्म. और राजनीतिक गँठजोड़ भी स्पष्ट है. सीमा पर लड़ रहे जवान से लेकर खेतों में क़र्ज़ के बोझ तले मर रहे किसान तक, ग़रीब मज़्दूर, दलित, अल्पसंख्यक और महिलाएँ— इन सबके लिए इनसाफ़ और इज़्ज़त की आवाज़ उठाना. रोहित वेमुला उसका नायक है. इसमें सुर कौन है और असुर कौन? लड़ाई अगर शुरू हुई तो दूर तक पहुँचेगी. सवाल यह है कि संसद में रस्मी लड़ाई के आदी हो गये विपक्ष के कारण सड़कों पर उपजी राजनीतिक शून्यता में कन्हैया बुलबुले की तरह उठ कर ग़ायब हो जायेगा या सुर-असुर की लड़ाई के चक्रव्यूह को भेदनेवाला महारथी बन कर उभरेगा, यह देखना दिलचस्प होगा.

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