सम्राज्बाद

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आदमी को हैं नहीं स्वीकार अब तक आदमी ।
देश के सीमा की अब तक हैं लकीरें,
बन रहे हैं शस्त्र लगते हैं जखीरे ।
हैं अभी तक तख्त तेवर ताज भी।
आदमी को हैं नहीं स्वीकार अब तक आदमी ।।
गर्भनी माता के सर पर टोकरी,
महल के नज़दीक जबतक झोपड़ी।
भूख की पीड़ा मे जबतक ताजगी।
आदमी को हैं नहीं स्वीकार तब तक आदमी ।।
आज तक जब खेत और लगान है,
कारखाने पर किसी का नाम है।
तो जी रहे हिटलर मुसोलनी आज भी । आदमी को हैं नहीं स्वीकार अब तक आदमी ।।
जातियों का युद्ध जबतक ठना है,
आज भी जब धर्म का खेमा बना है।
तो रहेगा तानाशहि राज भी ।
आदमी को हैं नहीं स्वीकार अब तक आदमी ।।

रचना –डॉ० मनोरंजन झा