दृष्टि में प्रदुषण

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निरंतर ध्वनि हवा पानी प्रदूषित
प्रदूषण ने धरा को भी छुआ है
आज मानस-धार वैचारिक प्रदुषण
कक्या व्यापत घर-घर में हुआ है

बंधू ! जिस घर में लिया बेटा जन्म
मोद का भंडार सारा है वहां
जन्म बेटी ने लिया जिस गेह में
है पड़ोसी को खबर उसकी कहाँ ?

जन्म देती पुत्र को है माँ मगर
पुत्री किसी माँ की दुलारी है वही
किंतु सामाजिक मुहर है पुत्र पर
न्याय कैसा हाय ! बेटी पर नहीं !

है जगत में कौन गुरुतर कार्य जो
पुत्र-सा पुत्री न जिसको कर दिया
कर्म –पथ जो कंटकाच्छादित सदा
निज श्रमो से कुसुम-किसलय भर दिया

पुत्र की गहरी प्रतीक्षा में बनो
दस पुत्रियों के बाप मत हे बंधुवर !
आज जनसंख्या विपुल का तुम कभी
लो नहीं अभिशाप अपने माथ पर

एक बेटे से करो संतोष तुम
व्यर्थ जोड़े की लगाना रट नहीं
ब्याह बेटी का करो सानन्द तुम
छोड़ जाओ पुत्र पर संकट नहीं

पुत्र-पुत्री में न अंतर हो कभी
भावना का दीप यह मन में जले
मात्र हम दो औ’ हमारे दो सुमन
सुरभिमय हो मोदमय जीवन तले

डॉ ‪‎भूपेंद्र मधेपुरी की रचना