वरिष्ठ कवि ,कलाकार थे महाप्रकाश जी

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सहरसा जिले के बनगांव में 14 जुलाई, 1949 को महाप्रकाश जी का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चोधरी के बाद वे मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं।
महाप्रकाश जी ने कहानियां भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गंभीर मूल्यांकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिंदी और बांग्ला में भी हुआ। महाप्रकाश जी ने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद विपक्ष पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूंजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वे निरंतर मुखर रहे। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी दर्जनों कहानियां बिखरी हुई हैं। शायद साहित्यकार और प्रकाशक गौरीनाथ के पास उनकी अधिकांश कहानियां हैं। उम्मीद है कि वे कहानियों की उनकी किताब पाठकों तक पहुचायेंगे।
(मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश जी 19 जनवरी, 2013 को हमारे बीच नहीं रहे।