बाल मजदूरी एक अभिशाप

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कोसी का यह इलाका हर वर्ष बाढ़ की समस्या से जूझता रहा है,कोसी की बलखाती धारा इस इलाके के लिए जिस तरह अभिशाप है ठीक उसी तरह कोशी,सीमांचल सहित बिहार के अन्य हिस्सों में मज़बूरी या अभिशाप बनी हुई है,सरकार के लाख दावों के बाद भी बाल मजदूरी सहित छोटे-छोटे नोनिहालो के ट्रैफिकिंग रोक पाने में बिफल रही है,है कभी-कभी इस ओर पुलिस को सफलता जरुर मिल पाया है,लेकिन दलालों की गिरफ़्तारी ना के बराबर रहा है | सरकार के लाख दावो के बाद भी बाल मजदूरी रुक ने का नाम नहीं ले रहा है ,बाल मजदूरी रोकने के लिए जहा कड़े कानुन बनाए गए है | साथ ही बाल मजदूरी को एक दंडनीय अपराध माना गया है,इस के बाद भी सहरसा,सुपौल,मधेपुरा सहित बिहार के अन्य हिस्सों में बाल मजदूरी ओने चरम सीमा पर है | बाल मजदूरी करने वाले बच्चे सुलभ से मिल जाते है ओर साथ ही इन नोनिहालो को अपने मेहनत के अनुसार न्यूनतम मजदूरी भी नसीब नहीं हो पता | प्रशासन की कुम्भ्करनी निंद्रा के कारण जिला मुख्यालय सहित प्रखंडो सहित सुदूर क्षेत्रों में आज भी इस अभिशाप पर रोक नहीं लग पायी है,इस ओर श्रम बिभाग की के कार्यशेली पर प्रशन खड़ा करता है | प्राप्त सुचना के अनुसार कुशल श्रमिकों की अपेक्षा बाल मजदूरों की ससमय सुलभता के साथ-साथ कम महेताना देने के कारण बाल मजदूरों से काम कर बाना ज्यादा पसंद करते है|एक ओर कुशल कामगार मजदूरों की मजदूरी करीब 280-350 रु प्रति दिन है वही बाल मजदूर 75-120 रु पर भी मिल जाते है | ओर कलम वाले नाजुक हाथों में भवन निर्माण,होटल,गेराज सहित अन्य जगहों पर जोखिम भरे कार्य करबाए जाते है| एक तरफ लाखों-करोड़ों खर्च कर सरकार शिक्षा का अधिकार कानुन,सर्व शिक्षा अभियान सहित अन्य का नारा बुलंद करने में लगी है,वही बच्चों को मिलने वाले मौलिक अधिकार की हवा निकलती नज़र आ रही है | जहा सरकार 6 से 14 वर्ष के नोनिहालो के लिए शिक्षा का अधिकार को मौलिक अधिकार दिया गया है, इस के बाद भी कोसी सहित बिहार के अन्य पिछड़े इलाके में नोनिहालो की बड़ी संख्या अपने सहित अपने परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए अपना बचपन व सपने बेचने को मजबूर है | आकड़ो पर नज़र दे तो सहरसा में लगभग 1200 के करीब होटल,गेराज,नर्सिंगहोम,ईट भट्टे सहित अन्य रोजगार के साधन है ओर इन प्रतिष्ठ्नो में 10-से 14-15 साल से बच्चे मजदूरी करते वाहे आम देखे जा सकते है,कोसी का यह पिछड़ा ईलाका बाढ़-सुखाड़-भुखमरी-बेरोजगारी की मूलभूत समस्याओं से जुझ रहा है,बाल मजदूरी के पीछे माँ-बाप की भी मज़बूरी होती है|  वर्ष 2008 में आयी कुसहा प्रलंकारी बाढ़ के बाद कोसी-सीमांचल से दर्जनो की संख्या में बाल श्रमिकों को दलालों द्दारा दिल्ली,पंजाब,हरियाणा सहित भारत के अन्य इलाको में भेजा गया जो अब तक अनवरत जारी है,इस बात का खुलासा इसी से लगा सकते है की बिगत 4-5 माह के दौरान सहरसा रेल पुलिस ने करीब 3 दर्जनों से अधिक बाल मजदूरों को सहरसा-अमृतसर (जनसेवा ट्रेन) से मुक्त करवा चुकी है,लेकिन किसी भी दलाल की गिरफ़्तारी ना के बराबर रही है| इस अभिशाप को रोकने के लिए बच्चों के माता-पिता द्दारा बच्चों को काम करने की आज़ादी देने या कल-कारखानों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद ही यह रुक सकता है,