मेरी भी सुनो 

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बहुत सोचकर तूफानों से जा टकराया मै,
वरना बहती धारा के संग बह सकता था मै |
स्वाभिमान और हक़ पर लड़ता-भिड़ता आया मै,
वरना तुम जैसा भी सत्ता गह सकता था मै |
दिल की आग को शोलों जैसा भड़काया हूं मै,
वरना ताप बुझाकर चैन से सो सकता था मै |
भूख,जहालत पर अनगिन नारे बरपाया मै,
वरना इसको करम लिखा कह रो सकता था मै |
हर शोषण पर बागी परचम बन लहराया मै,
वरना मौज से समझोते कर जी सकता था मै |
कफन चोर,बेईमानों से लड़ता आया हूं मै,
तुम सा कंबल ओढ़ के घी भी पी सकता था मै |

रचना –आनंद मोहन (पुर्व सांसद )