आतंक‬ की दिवाली

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सच्चाई पर झूठ का पर्दा गिराया जा रहा ,
जम्हूरियत के कत्ल का जलसा मनाया जा रहा ,
मुजरिम जो थे इस “सदन” के माननीय बन गए ,
बेकसूरों को ही अब कातिल बताया जा रहा |
जाति की दुकान में और धर्म के बाज़ार में ,
अगड़ा-पिछड़ा,हिन्दू-मुस्लिम को सजाया जा रहा,
कुर्सी के गंदे खेल के किरदार बन हम रह गए,
सियासत के शतरंज का प्यादा बनाया जा रहा |
वादों का मरहम यहाँ आश्वासनों की थपकियां,
पानी के बदले हमे,आंसू पिलाया जा रहा,
बातें की बदलाव की तो बागी बतलाया गया ,
रोटी की आवाज़ दी,गोली खिलाया जा रहा |
झोपड़ो की राखपर,अट्टालिकाओ का शहर ,
मनुष्यता की मौत पर मंदिर बसाया जा रहा,
खून की होली यहाँ,आतंक की दीपावली ,
“मोहन”सिसकते ख्वाबो का उत्सव मनाया जा रहा |

आनंद मोहन (पुर्व सांसद रचित)