तनहा हूं

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तनहा हूं,पर वक्त न जाया करता हूँ
दीवारों को दर्द सुनाया करता हूं |
दुःख है,दर्द है,काटें है, गम,तन्हाई,
भुल गमों का दर्द उड़ाया करता हूं |
भुले-भटके,बिछुड़े है
जो मीत मेरे,
यादों का पैबंद लगाया करता हूं |
सोता है जब सारा आलम रातों में,
मै जगकर आलाप सुनाया करता हूं |
धन-दौलत और शोहरत को तरसे दुनिया ,
मै अपना धन मुफ्त लुटाया करता हूं |
गूंगे,बहरे,अंधे है ,
जो लोग यहाँ ,
मै सच की तस्वीर दिखाया करता हूं,
तनहा हूं,पर वक्त न जाया करता हूँ

रचना –आनंद मोहन (पुर्व सांसद)