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देश के सबसे पिछड़े कोसी-सीमांचल इलाके में नेट-कर्फ्यू के दौर !

पटना@पुष्यमित्र :देश के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों को शायद ही इस बात की खबर हो कि पिछले चार दिनों से बिहार के सबसे पिछड़े इलाके कोसी और सीमांचल के सात जिलों में नेट-कर्फ्यू लगा हुआ था. मतलब, साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति से बचने के लिए प्रशासन ने इंटरनेट सेवा को पूरी तरह बंद कर दिया था. इस बीच पत्रकार से लेकर व्यवसायी तक सब परेशान रहे और सोशल मीडिया के जरिये दूर-दराज में रहने अपने परिजनों से जुड़े लोगों ने मन मार कर इस पीड़ा को बरदास्त किया. सोशल मीडिया को लेकर अतिसक्रिय माने जाने वाले इस इलाके में पिछले एक साल में नेट कर्फ्यू की यह चौथी या पांचवी घटना है. हालांकि इलाके के लोग स्थितियों को देखते हुए प्रशासन के इस कदम का समर्थन करते हैं, मगर साथ ही यह भी कहते हैं कि क्या कोई और विकल्प नहीं हो सकता. डिजिटल माध्यमों पर पूरी तरह निर्भर हो चुकी दुनिया में कानून-व्यवस्था के मामलों को लेकर बार-बार नेट-कर्फ्यू लगाना कहां तक उचित है.

यह सच है कि इस बार जिस बात को लेकर नेट-कर्फ्यू लगाया गया, वह काफी गंभीर थी. पहली नजर में प्रशासन के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो रहा था कि आखिर ऐसा हो कैसे गया. इधर मुरलीगंज बाजार में लोग काफी उग्र हो गये थे और कुछ साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग गुस्से को आग दिखाने के लिए भी जुटने लगे. अगर इस घटना की जानकारी सोशल मीडिया खास कर वाट्सएप के जरिये शेयर की जानी शुरू होती तो पूरा कोसी-सीमांचल भीषण दंगे की आग में झुलस जाता. ऐसे में मधेपुरा जिला प्रशासन को तत्काल एक्शन लेना पड़ा. बाद में इलाके के सातो जिले में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गयी.

मगर इस वजह से लोगों को ऐसी-ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जीएसटी सेवा में हर रोज सूचना अपडेट करने की जरूरत होती है, ऐसे में व्यापारियों को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. स्थानीय पत्रकार जो खबरों के प्रेषण में पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर हो चुके हैं. वे उन सीमावर्ती इलाकों की तलाश में भागते रहते, जहां इंटरनेट सेवा चालू थी. दिलचस्प है कि इस इलाके में कई ऑनलाइन पोर्टल भी संचालित होते हैं. देश और विदेश में रहने वाले इन इलाकों के लोग स्थानीय खबरों के लिए इन पोर्टलों पर निर्भर रहते हैं. इन तमाम पोर्टलों को अपना काम चार दिनों के लिए बंद करना पड़ा. डेढ़ लाख से अधिक सदस्यों वाला फेसबुक ग्रुप खबर सीमांचल भी ठप रहा.

इससे पहले भी इस इलाके में कई दफा नेट-कर्फ्यू लगाया जा चुका है. मगर तब एक या दो जिले में नेट सेवा बंद होती थी. लोग पास के जिले में जाकर किसी तरह काम चला लेते थे. मगर इस बार की नेटबंदी ने लोगों को काफी परेशान किया. जिन लोगों से मेरी फोन पर बातें हुई, उनमें एक धड़ा ऐसा था जो नेट-कर्फ्यू का सख्त विरोधी थी. उसका कहना था कि जब कश्मीर में इंटरनेट बंद होता है तो इतना बवाल होता है. यहां जब जी आये नेट बंद कर दिया जाता है. वहीं दूसरी तरह ऐसे लोग भी हैं, जो कह रहे हैं कि इस बार नेटबंदी नहीं होती तो इलाके को बचाना मुश्किल होता. मगर आगे के लिए प्रशासन को दूसरे उपायों पर भी सोचना चाहिये. क्योंकि अब स्थितियां ऐसी बनती जा रही है कि इंटरनेट के बिना लोगों का काम नहीं चलता. चार-चार दिन इंटरनेट का बंद रहना परेशानी का सबब बन जाता है.

हालांकि पिछली दफा जब मधेपुरा में इंटरनेट सेवा बंद की गयी थी तो बाद में प्रशासन ने आदेश निकाला था कि हर वाट्सएप ग्रुप में और फेसबुक पेज पर प्रशासन के एक व्यक्ति को रखना पड़ेगा. तब लोगों ने इसे प्राइवेसी का मसला बता कर विरोध किया था और यह फैसला वापस लेना पड़ा था. प्रशासन को थोड़े और इन्नोवेटिव उपाय तलाशने होंगे. दुनिया डिजिटल हो रही है, ऐसे में आप किसी को नहीं कह सकते कि आप चार रोज बिना इंटरनेट के रहें.

(साभार : http://pushymitr.blogspot.in से )

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